वर्दी से झाड़ू तक: कौन हैं पद्मश्री पाने वाले 88 साल के जांबाज पूर्व IPS इंदरजीत सिंह सिद्धू?
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नई दिल्ली/चंडीगढ़: राष्ट्रपति भवन का ऐतिहासिक दरबार हॉल मंगलवार को एक ऐसे दृश्य का गवाह बना, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जब 88 वर्षीय पूर्व आईपीएस अधिकारी सरदार इंदरजीत सिंह सिद्धू को पद्मश्री से सम्मानित किया, तो पूरा देश इस सच्चे कर्मयोगी के समर्पण को नमन कर रहा था।

आतंकवाद के दौर के जांबाज अधिकारी

6 जून 1938 को पंजाब के संगरूर में जन्मे इंदरजीत सिंह सिद्धू का करियर बेहद शानदार रहा। 1963 में पुलिस सेवा में आने वाले सिद्धू 1981 में आईपीएस बने। उन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में सांबा सेक्टर में जिम्मेदारी निभाई। 1986 में पंजाब में जब आतंकवाद अपने चरम पर था, तब अमृतसर के सिटी एसपी के रूप में उन्होंने कानून-व्यवस्था बहाली में लोहा मनवाया था।

रिटायरमेंट के बाद बनी झाड़ू योद्धा की पहचान

31 दिसंबर 1996 को चंडीगढ़ में डीआईजी (सीआईडी) के पद से रिटायर होने के बाद सिद्धू ने शांति से जीवन बिताने के बजाय समाज सेवा को चुना। जब उन्होंने अपने आसपास के लोगों को सड़कों पर कचरा फेंकते देखा, तो उन्होंने शिकायत करने के बजाय खुद सफाई की कमान संभाल ली। एक पूर्व उच्चाधिकारी को सड़क पर झाड़ू लगाते देख पहले लोग हैरान हुए, लेकिन धीरे-धीरे उनकी इस मुहिम ने पूरे समाज को प्रेरित कर दिया।

एक्सीडेंट भी नहीं डिगा पाया संकल्प

सिद्धू के जज्बे का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक सड़क हादसे में पैर में गंभीर चोट लगने के बावजूद उन्होंने सफाई का काम नहीं छोड़ा। आज भी वे एक हाथ में छड़ी और दूसरे में झाड़ू लेकर अपनी सोसाइटी को स्वच्छ रखते हैं। उनके इस समर्पण को देखकर उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी सलाम करते हुए कहा था कि— पर्पज (उद्देश्य) कभी रिटायर नहीं होता।

सादगी और कर्मठता की मिसाल

डिजिटल युग में भी सिद्धू मोबाइल फोन नहीं रखते और लाइमलाइट से दूर रहते हैं। पद्मश्री मिलने की सूचना मिलने के बाद भी वे जश्न मनाने के बजाय अपनी रोजमर्रा की सफाई में जुट गए थे। 2023 में पत्नी के निधन के बाद वे अकेले रहते हैं, लेकिन उनका सेवा भाव आज भी अटूट है। स्वच्छता को अपना धर्म मानने वाले सिद्धू का यह सम्मान उन सभी के लिए एक सबक है, जो सिर्फ अधिकारों की बात करते हैं, कर्तव्यों की नहीं।

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