भरत तिवारी एनकाउंटर: घिरे सम्राट चौधरी, अपने ही नेताओं के निशाने पर ‘पुलिसिया राज’
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बिहार में भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। कल तक जो एनडीए नेता पुलिस की कार्यशैली और सीएम सम्राट चौधरी की सख्ती की तारीफ कर रहे थे, आज वही नेता इस घटना को लेकर बेहद आक्रामक और असहज दिख रहे हैं। यह एनकाउंटर अब सम्राट चौधरी के लिए गले की हड्डी बन गया है।

अश्विनी चौबे का तीखा हमला पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने इसे ‘दर्दनाक और हृदय विदारक’ बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। चौबे के मुताबिक, भरत तिवारी कोई अपराधी नहीं, बल्कि समाज के वंचित वर्गों की आवाज थे। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके परिवार को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया और एक निर्दोष व्यक्ति को निशाना बनाया गया।

जदयू नेताओं ने भी उठाए सवाल जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद संजय झा ने स्पष्ट कहा है कि घटना का वीडियो संदेह पैदा करता है। उन्होंने निलंबन को नाकाफी बताते हुए सीनियर अधिकारियों से समयबद्ध जांच की मांग की है। वहीं, मंत्री अशोक चौधरी ने तो इसे सीधे तौर पर ‘हत्या’ करार दिया है। उन्होंने दो टूक कहा कि पुलिस को किसी को भी गोली मारने का अधिकार नहीं है, ऐसे पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा चलना चाहिए।

जीतन राम मांझी की फजीहत इस मामले में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का स्टैंड उल्टा पड़ गया। उन्होंने पुलिस की कार्रवाई का समर्थन करते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, जिसके बाद उन्हें जनता के भारी विरोध और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा। इस फजीहत के बाद एनडीए खेमे के कई अन्य नेता अब इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं।

क्या सम्राट चौधरी के लिए बढ़ी मुश्किल? यह एनकाउंटर अब सम्राट चौधरी के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट बनता जा रहा है। पुलिस को बेहिसाब छूट देने की नीति पर अब सवाल उठने लगे हैं। भले ही सीधे तौर पर मुख्यमंत्री का नाम न लिया जा रहा हो, लेकिन जिस तरह से सहयोगी दल ही पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं, वह सीधे तौर पर सम्राट चौधरी के नेतृत्व और उनकी प्रशासनिक पकड़ पर बड़ा दाग साबित हो रहा है।

निष्कर्ष भरत तिवारी एनकाउंटर ने यह साफ कर दिया है कि बिहार में ‘सब कुछ ठीक है’ की छवि अब दरकने लगी है। विरोधी तो पहले से ही हमलावर थे, लेकिन अब अपने ही गठबंधन में घिरे सम्राट चौधरी के सामने यह बड़ा यक्ष प्रश्न है कि क्या वे पुलिस को सुधारेंगे या अपनों के विरोध के बीच अपनी कुर्सी बचाएंगे?

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