राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। इसी महत्वपूर्ण पड़ाव पर संगठन एक नए विवाद के केंद्र में है। कांग्रेस नेता प्रियांक खरगे ने सवाल उठाया है कि आखिर भारत का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन बिना किसी सरकारी रजिस्ट्रेशन के क्यों काम कर रहा है? इसके साथ ही उन्होंने संगठन की फंडिंग, टैक्स अनुपालन और ऑडिट पर भी सवाल खड़े किए हैं।
क्या रजिस्ट्रेशन न कराना गैरकानूनी है? कानूनी जानकारों का मानना है कि भारत में रजिस्ट्रेशन न कराना संगठन को गैरकानूनी नहीं बनाता। वरिष्ठ अधिवक्ता अवनीश रंजन मिश्रा के अनुसार, रजिस्ट्रेशन केवल उन संस्थाओं के लिए अनिवार्य है जो सरकारी लाभ या अनुदान लेना चाहती हैं। चूंकि संघ सरकारी सहायता नहीं लेता, इसलिए उसे पंजीकरण की वैधानिक मजबूरी नहीं है।
मोहन भागवत का पक्ष: ब्रिटिश काल में शुरू हुई थी यात्रा संघ प्रमुख मोहन भागवत का तर्क है कि आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई थी, जब ब्रिटिश शासन था। उस दौरान पंजीकरण का कोई प्रावधान नहीं था। आजादी के बाद भी ऐसा कोई कानून नहीं बना जिसने किसी संगठन के लिए पंजीकरण अनिवार्य किया हो। भागवत का स्पष्ट कहना है कि संघ एक व्यक्तियों का समूह (Body of Individuals) के रूप में कार्य करता है और यह पहचान उसे अदालतों व आयकर विभाग से मिली है।
गुरु दक्षिणा और म्यूचुअलिटी का सिद्धांत आरएसएस की आय का मुख्य स्रोत गुरु दक्षिणा है। 1970 के दशक में जब इस पर टैक्स लगाने की कोशिश हुई, तो संघ ने म्यूचुअलिटी (Principle of Mutuality) का सिद्धांत पेश किया। इसका अर्थ है कि यदि कुछ लोग मिलकर साझा कोष बनाते हैं और उसी कोष का उपयोग अपने सदस्यों के हित में करते हैं, तो वह आय नहीं मानी जाती। 1980 में आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए संघ को कर-मुक्त माना था।
पारदर्शिता पर संघ का क्या कहना है? विवाद के बीच मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि भले ही वे रजिस्टर्ड न हों, लेकिन संगठन अपने हर खर्च का पूरा हिसाब रखता है। संघ चार्टर्ड अकाउंटेंट के माध्यम से अपने खातों की ऑडिट कराता है। भागवत ने कहा, यदि सरकार कभी हमसे हिसाब मांगती है, तो हम अपनी पूरी पारदर्शिता दिखाने के लिए तैयार हैं।
क्या यह मुद्दा केवल राजनीतिक है? प्रियांक खरगे का पत्र और इस पर छिड़ी बहस यह दर्शाती है कि देश के सबसे पुराने संगठनों में से एक की कार्यप्रणाली अब फिर से सार्वजनिक चर्चा में है। जहां एक ओर इसे जवाबदेही की मांग के रूप में देखा जा रहा है, वहीं संघ इसे अपनी 100 साल पुरानी वैचारिक पहचान के साथ जुड़ा मामला मानता है। फिलहाल, कानूनी रूप से संघ अपनी स्थापित स्थिति पर अडिग है।
Dear Shri Mohan Bhagwat ji,
— Priyank Kharge / ಪ್ರಿಯಾಂಕ್ ಖರ್ಗೆ (@PriyankKharge) June 15, 2026
My letter will reach you shortly. However, I thought it was important to draw your attention to this matter early.
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Firstly, congratulations to the RSS on completing 100 years.
An organisation that claims over 60,000 shakhas and crores of… pic.twitter.com/IZy4oeKdMp
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