राष्ट्रपति का एमपी दौरा: जीतू पटवारी ने पत्र लिखकर उठाईं आदिवासी समाज की 10 बड़ी मांगें
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू अपने पांच दिवसीय मध्यप्रदेश दौरे पर हैं। इस बीच, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने उन्हें एक विस्तृत पत्र लिखकर राज्य के आदिवासी समुदाय की गंभीर समस्याओं और चुनौतियों की ओर उनका ध्यान आकर्षित किया है।

आदिवासी समाज की वास्तविक स्थिति पर चिंता देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति होने के नाते, पटवारी ने राष्ट्रपति से अपेक्षा जताई है कि वे अपने प्रवास के दौरान आदिवासी समाज की जमीनी हकीकत को करीब से देखें। पत्र में कहा गया है कि मध्यप्रदेश देश की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी वाला राज्य है, जहां करीब 1.53 करोड़ आदिवासी निवास करते हैं, लेकिन विकास की मुख्यधारा से वे अब भी दूर हैं।

शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल कांग्रेस अध्यक्ष ने शिक्षा व्यवस्था को आदिवासी उत्थान में सबसे कमजोर कड़ी बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि दूरस्थ इलाकों के स्कूलों में शिक्षकों के भारी पद रिक्त हैं और छात्रावासों की स्थिति दयनीय है। वहीं, स्वास्थ्य सेवाओं पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, कुपोषण और एनीमिया जैसी समस्याएं आदिवासी अंचलों में आज भी विकराल रूप में मौजूद हैं।

बेरोजगारी, पलायन और जल-जंगल-जमीन का मुद्दा पत्र में उल्लेख किया गया है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर न होने के कारण आदिवासी युवा पलायन करने को मजबूर हैं। इसके अलावा, वनाधिकार कानूनों के लचर क्रियान्वयन और विस्थापन के कारण आदिवासी समाज न केवल अपनी भूमि, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान भी खो रहा है। महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक न्याय को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताई गई हैं।

राष्ट्रपति से 10 प्रमुख मांगें जीतू पटवारी ने राष्ट्रपति के समक्ष 10 सूत्रीय मांगें रखी हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

  1. आदिवासी क्षेत्रों के लिए विशेष शिक्षा और स्वास्थ्य पैकेज।
  2. रिक्त पदों पर तत्काल भर्ती।
  3. वनाधिकार कानून का कठोरता से पालन।
  4. युवाओं के लिए रोजगार मिशन की शुरुआत।
  5. महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कदम।
  6. टीएसपी (TSP) फंड का पारदर्शी और सही उपयोग।
  7. सामाजिक-आर्थिक स्थिति की उच्चस्तरीय समीक्षा।

संवाद की अपील अंत में, पटवारी ने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि वे अपने दौरे के दौरान आदिवासी प्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों के साथ सीधा संवाद करें। उन्होंने उम्मीद जताई कि राष्ट्रपति का हस्तक्षेप राज्य सरकार को आदिवासी हितों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने में सहायक सिद्ध होगा।

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