क्या अमेरिकी विदेश मंत्री का बयान भारत के लिए एक खतरनाक चेतावनी है?
News Image

ओमान की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना के हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक तनाव गहरा गया है। इस मामले में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के हालिया बयान ने भारत में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है।

क्या था मामला? बीते 9 जून को अमेरिकी सेना ने ओमान के तट पर सेटेबेलो नाम के एक कमर्शियल जहाज पर हमला किया था। इस जहाज पर 24 भारतीय सवार थे, जिनमें से तीन की मौत हो गई। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने खुद हमले की पुष्टि की थी। इसके अलावा 8 और 11 जून को भी भारतीय क्रू वाले जहाजों को निशाना बनाया गया था।

रुबियो का बयान: संवेदना की जगह चेतावनी भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से फोन पर बात कर इस घातक हमले का कड़ा विरोध जताया था। हालांकि, इसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने जो बयान जारी किया, उसमें खेद जताने के बजाय कड़ी चेतावनी दी गई।

रुबियो ने स्पष्ट कहा कि अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन और ईरानी तेल की अवैध ढुलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने जोर दिया कि सभी कमर्शियल जहाजों को अमेरिकी सेना के आदेशों का तुरंत पालन करना चाहिए।

भारत में तीखी प्रतिक्रिया इस बयान ने भारत में विपक्षी दलों और पूर्व राजनयिकों को स्तब्ध कर दिया है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इसे अत्यंत असंवेदनशील करार देते हुए पूछा कि क्या कोई रणनीतिक साझेदार इतना असंवेदनशील हो सकता है कि बेगुनाह जानों के नुकसान पर अफसोस तक न जताए?

वहीं, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भारत सरकार की प्रतिक्रिया को शर्मनाक बताते हुए कहा कि भारत को बिना शर्त माफी की मांग करनी चाहिए थी, न कि सिर्फ उचित नहीं जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए था।

कूटनीति बनाम ताकत की धमकी विशेषज्ञों का मानना है कि रुबियो का बयान कूटनीति के दायरे से बाहर है। रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल जीडी बख्शी (रिटायर्ड) ने सवाल उठाया कि जब ईरान का भारी तेल चीन जा रहा है, तो अमेरिकी निशाना केवल भारतीय नाविक क्यों बन रहे हैं?

पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अब ताकत की भाषा (प्रतिबंध, नाकेबंदी, जबरदस्ती) हावी हो रही है। न्यूयॉर्क टाइम्स के एडवर्ड वॉन्ग जैसे पत्रकारों ने इसे सीधे तौर पर भारत के लिए चेतावनी करार दिया है।

सरकार की चुनौती विपक्ष और रणनीतिक जानकारों का आरोप है कि मोदी सरकार की प्रतिक्रिया बेहद कमजोर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत इस मामले को केवल औपचारिक विरोध तक सीमित रखता है, तो यह भविष्य में और भी घातक साबित हो सकता है। फिलहाल, वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच की यह कूटनीतिक खटास भारत की विदेश नीति के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गई है।

कुछ अन्य वेब स्टोरीज

Story 1

टारगेट का प्रेशर छोड़ो, सुकून से सो जाओ: स्टार्टअप बॉस ने कर्मचारियों को बांटे 3-3 लाख रुपये के स्मार्ट गद्दे

Story 1

दिल्ली की झुग्गियों में आएगा बदलाव: 4 लाख परिवारों को पक्का घर, यमुना को भी मिलेगी संजीवनी

Story 1

IND A vs AFG A: फाइनल की रेस में भारत के लिए करो या मरो का मुकाबला, आज जीत जरूरी

Story 1

एम्बाप्पे का ऐतिहासिक धमाका: फ्रांस ने सेनेगल को 3-1 से रौंदा, तोड़े कई बड़े रिकॉर्ड

Story 1

एमपी मानसून सत्र में UCC का धमाका: क्या जनजातीय समुदायों को मिलेगी छूट? जानिए पूरी योजना

Story 1

चलती ट्रेन में सो रहे यात्री की जेब से महिला ने उड़ाया फोन, वीडियो देख दंग रह गए लोग

Story 1

G-7 समिट के अनसुने किस्से: मेलोनी की नई आदत, ट्रंप का मजाक और नेताओं की निजी बातचीत

Story 1

अल नीनो का संकट: शिवराज सिंह चौहान ने 10 राज्यों को दिए सुरक्षा के निर्देश, बनाई जाएगी आकस्मिक योजना

Story 1

हिम्मत है तो इस्तीफा दो: TMC के बागी सांसदों को हुमायूं कबीर की दो-टूक चुनौती

Story 1

12 साल से न बैठे, न लेटे! महादेव की भक्ति में इस साधु का कठिन त्याग देख दंग रह गई दुनिया