टीएमसी में बड़ी टूट: 20 सांसदों ने किया नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी में विलय, एनडीए के साथ जाने का ऐलान
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) एक बड़े राजनीतिक संकट से जूझ रही है। पार्टी के भीतर बगावत का बिगुल बज चुका है और अब 20 लोकसभा सांसदों ने टीएमसी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी में विलय करने का दावा किया है।

सांसदों की ओम बिरला से मुलाकात रविवार (14 जून) को बागी गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार और सुदीप बंदोपाध्याय ने दिल्ली में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात की। सांसदों ने मांग की है कि सदन में उन्हें टीएमसी से अलग बैठने की अनुमति दी जाए। काकोली घोष ने कहा कि उनके पास 20 सांसदों का समर्थन है, जो पार्टी की कुल संख्या (28) का दो-तिहाई से अधिक है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वे अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में एनडीए के साथ काम करेंगे।

अदालत तय करेगी असली टीएमसी कौन बागी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा कि नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी एक मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय पार्टी है और वे अब उसी का हिस्सा हैं। उन्होंने यह भी कहा कि असली टीएमसी कौन है, इसका फैसला अब अदालत में होगा। गौरतलब है कि चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, यह पार्टी त्रिपुरा की एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक इकाई है।

अभिषेक बनर्जी और ममता खेमे का कड़ा विरोध पार्टी में मची इस खलबली के बीच टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर मांग की है कि किसी भी बागी गुट को मान्यता न दी जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि टीएमसी को सदन में सिर्फ एक ही पार्टी के रूप में देखा जाना चाहिए।

संविधान का उल्लंघन और विश्वासघात टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद और सागरिका घोष ने भी स्पीकर से मुलाकात कर इस विलय को असंवैधानिक करार दिया है। कीर्ति आजाद ने कहा कि दल-बदल कानून के तहत पार्टी में इस तरह का विभाजन संभव नहीं है। वहीं, सागरिका घोष ने बागी नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा, जिन लोगों ने ममता बनर्जी के चेहरे पर चुनाव जीता, वे आज सत्ता के लिए उसी पार्टी को छोड़ रहे हैं, जिसके खिलाफ उन्होंने चुनाव लड़ा था। यह बेहद शर्मनाक है।

ममता के लिए अस्तित्व की लड़ाई टीएमसी के लिए संकट सिर्फ लोकसभा तक सीमित नहीं है। राज्य विधानसभा में भी पार्टी के 60 विधायक पहले ही बगावत कर चुके हैं। इसके अलावा, सुष्मिता देव और सुखेंदु शेखर रे जैसे वरिष्ठ राज्यसभा सांसदों का इस्तीफा पार्टी के लिए बड़ा झटका है। अब राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या टीएमसी अपना चुनाव चिह्न भी बचा पाएगी, जैसा कि महाराष्ट्र में शिवसेना के मामले में देखने को मिला था।

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