सरकारी मदद का कड़वा सच : बीमार बैल थमाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ गए अधिकारी?
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लातूर के बोंबली गांव के गरीब किसान काशीनाथ गायकवाड की कहानी एक बार फिर चर्चा में है। खेत जोतने के लिए पत्नी का कंधा इस्तेमाल करने वाली उनकी तस्वीर ने पूरे महाराष्ट्र को झकझोर दिया था। अब यही मामला सरकारी संवेदनहीनता की नई मिसाल बन गया है।

इंसानियत का दिखावा या फोटो-सेशन? वीडियो वायरल होने के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने त्वरित सहायता के निर्देश दिए। 10 जून को अधिकारियों ने एक गौशाला से बैल लाकर किसान को सौंपा। आरोप है कि अधिकारियों ने सिर्फ फोटो खिंचवाने और वीडियो बनवाने के लिए बैल को हल से जोता, ताकि मुख्यमंत्री के आदेश का पालन सफलतापूर्वक दिखाया जा सके।

मदद बनी बीमार बोझ अधिकारियों द्वारा दिया गया बैल इतना कमजोर और कुपोषित निकला कि वह खेत में एक कदम भी नहीं चल सका। पशु चिकित्सकों ने भी पुष्टि की कि यह जानवर खेती के लायक नहीं है। नतीजा यह हुआ कि किसान को अब अपनी खेती छोड़कर उस बीमार बैल के इलाज और खुराक पर खर्च करना पड़ रहा है।

समय पर पैसे मिले, लेकिन अवसर हाथ से निकला विपक्ष के दबाव के बाद प्रशासन ने 50,000 रुपये की अतिरिक्त नकद सहायता दी। लेकिन अधिकारियों की लापरवाही का आलम यह रहा कि यह पैसा बाजार के दिन के बाद किसान के हाथ में पहुँचा। लातूर में बैलों का बाजार मंगलवार को लगता है, और देरी के कारण किसान बुवाई के महत्वपूर्ण समय पर अपना बैल नहीं खरीद पाया।

विपक्ष का तीखा हमला कांग्रेस नेताओं समेत रोहित पवार ने इस घटना को अन्नदाता का अपमान करार दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार ने सोशल मीडिया पर अपनी इमेज सुधारने के लिए किसान को बीमार बैल थमाकर उसके जले पर नमक छिड़कने का काम किया है।

अगले मंगलवार का इंतज़ार फिलहाल, काशीनाथ गायकवाड का परिवार अब अगले मंगलवार के बाजार का इंतजार कर रहा है ताकि वे कोई सक्षम बैल खरीद सकें। तब तक, सरकारी मदद के नाम पर मिला वह बीमार जानवर उनके घर के आंगन में किसी बोझ से कम नहीं है। क्या वाकई यह मदद थी, या बस दिखावे की एक और औपचारिकता?

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