ईरान ने कुवैत को क्यों बनाया अपना प्रमुख निशाना? जानिए इसके पीछे का खतरनाक खेल
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खाड़ी देशों में एक समय तक बेहद सतर्क रहने वाला कुवैत अब क्षेत्रीय अस्थिरता के केंद्र में आ गया है। 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ शुरू हुए ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के बाद से तेहरान ने जवाबी कार्रवाई में कुवैत को अपना मुख्य निशाना बनाया है। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों ने कुवैत के हवाई अड्डों, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है, जिससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में हड़कंप है।

ईरान की आक्रामकता के पीछे का असली कारण

विश्लेषकों का मानना है कि कुवैत पर इन हमलों के पीछे दो प्रमुख कारण हैं: भौगोलिक निकटता और अमेरिकी सैन्य मौजूदगी। कुवैत में लगभग 13,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। ईरान के लिए ये अड्डे किसी भी अमेरिकी हवाई या समुद्री अभियान का मुख्य आधार बन सकते हैं। इन हमलों के जरिए ईरान कुवैत पर दबाव बनाना चाहता है ताकि वह अमेरिकी सेना को अपने यहां से हटाए या उनके हवाई क्षेत्र के उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दे।

ऑपरेशन एपिक फ्यूरी का कुवैत पर असर

शुरुआत में कुवैत ने दावा किया था कि अमेरिकी अभियान के लिए उसकी जमीन का इस्तेमाल नहीं किया गया है। लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक, ईरानी हमलों के दबाव में आने के बाद कुवैत ने 24 और 31 मार्च को अमेरिकी सेना को अपनी सैन्य सुविधाओं का इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम ने कुवैत को ईरान की आंखों में एक सक्रिय युद्ध मोर्चा बना दिया है, जिससे भविष्य में उस पर हमलों का खतरा और बढ़ गया है।

क्या अमेरिकी सैन्य अड्डे सुरक्षा कवच हैं या खतरा?

दशकों से खाड़ी देशों का मानना था कि अमेरिकी सैन्य अड्डे उनकी सुरक्षा की गारंटी हैं। हालांकि, हालिया संघर्षों ने इस भ्रम को तोड़ दिया है। ये अड्डे न तो हमलों को रोकने में सक्षम रहे हैं और न ही इन्होंने तत्काल अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप की गारंटी दी है। अब खाड़ी देशों में इस बात पर गंभीर बहस छिड़ गई है कि क्या अमेरिकी अड्डों से मिलने वाला लाभ, उनके कारण पैदा होने वाले बड़े जोखिमों से ज्यादा है।

आंतरिक सुरक्षा: क्या सुन्नी-शिया तनाव बढ़ेगा?

कुवैत की कुल आबादी में लगभग 25 से 30 प्रतिशत शिया हैं। कुवैत के इतिहास में सुन्नी-शिया संबंध आमतौर पर सौहार्दपूर्ण रहे हैं और 1990 के इराक संकट ने दोनों समुदायों के बीच एकता को और मजबूत किया था। ईरान का हालिया हमला एक चुनौती है, लेकिन अब तक कुवैत ने अपनी आंतरिक स्थिरता और सांप्रदायिक एकता को बनाए रखा है।

कुल मिलाकर, कुवैत अब एक ऐसी कूटनीतिक और सैन्य दुविधा में फंसा है, जहां उसे अपनी संप्रभुता बचाने के लिए ईरान के बढ़ते गुस्से और अमेरिकी गठबंधन की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना होगा।

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