कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के मुहाने पर है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, जिससे राज्य में नेतृत्व परिवर्तन का रास्ता साफ हो गया है। अब कांग्रेस के दिग्गज नेता डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने की चर्चाएं तेज हैं। आइए जानते हैं आखिर क्यों कर्नाटक की सियासत में हर पांच साल में समीकरण बदल जाते हैं और इसके पीछे का जातीय आधार क्या है।
अहिंदा (AHINDA) और कांग्रेस का वोट बैंक कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के पीछे AHINDA (अहिंदा) फॉर्मूले का बड़ा हाथ है। यह कन्नड़, अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित समुदायों का एक गठबंधन है। सिद्धारमैया, जो खुद कुरुबा (OBC) समुदाय से आते हैं, इस राजनीति के सबसे बड़े चेहरे रहे हैं। वहीं, डीके शिवकुमार को पार्टी का संकटमोचक और फंड जुटाने में माहिर माना जाता है। हाईकमान के दखल के बाद, सत्ता का यह हस्तांतरण ढाई साल के अनौपचारिक वादे के तहत हो रहा है।
जातिगत समीकरण: लिंगायत और वोक्कालिगा का दबदबा कर्नाटक की राजनीति जातियों के इर्द-गिर्द घूमती है:
सत्ता का पुराना इतिहास और रस्साकशी कर्नाटक में यह चलन रहा है कि जनता हर पांच साल में सत्ता बदल देती है। 2013 में सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस जीती थी, लेकिन 2018 में त्रिशंकु विधानसभा के बाद कांग्रेस-JD(S) गठबंधन की सरकार बनी, जो मात्र 14 महीने ही चल पाई। बागी विधायकों के पाला बदलने से 2019 में भाजपा सत्ता में आई। 2023 में कांग्रेस ने 135 सीटों के साथ प्रचंड वापसी की थी।
अब आगे क्या? सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद अब सबकी नजरें डीके शिवकुमार पर टिकी हैं, जो 30 मई को नई कैबिनेट के साथ शपथ ले सकते हैं। दूसरी ओर, भाजपा 2028 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए युवा नेतृत्व की तलाश कर रही है। वहीं, JD(S) अपने अस्तित्व को बचाने की जंग लड़ रही है। कर्नाटक की बदलती सियासी बिसात पर अब हर किसी की निगाहें इस बात पर हैं कि क्या कांग्रेस का यह पावर शेयरिंग मॉडल राज्य में गुटबाजी को खत्म कर पाएगा।
#WATCH | Bengaluru | Congress MLA Ajay Singh says, One of the longest serving chief ministers of Karnataka across all three parties, Mr Siddaramaiah, has tendered his resignation. It is a sad day for all legislators. Since day one, he has been saying that the day the party high… pic.twitter.com/nSx2qy5AwN
— ANI (@ANI) May 28, 2026
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