# नॉर्वे के अखबार में भारत का अपमान: क्या 140 करोड़ भारतीयों के आत्मसम्मान को कार्टून कहकर नजरअंदाज किया जा सकता है?
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नस्लवादी मानसिकता का खुला प्रदर्शन नॉर्वे के प्रतिष्ठित अखबार आफ़्टेनपोस्टेन (Aftenposten) में हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक कार्टून छापा गया, जिसने वैश्विक स्तर पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। इस कार्टून में पीएम मोदी को न केवल अपमानजनक तरीके से दिखाया गया, बल्कि उन्हें और उनके जरिए पूरे भारत को काला प्रदर्शित कर नस्लभेदी सोच का परिचय दिया गया। यह महज एक कार्टून नहीं, बल्कि भारतीयता पर किया गया एक गहरा मानसिक प्रहार है।

कार्टूनिस्ट की काली सोच और पुरस्कार का विरोधाभास यह कार्टून 62 वर्षीय मार्विन हालेराकर ने बनाया है, जिन्हें नॉर्वे में पत्रकारिता का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुका है। जिस देश में नस्लीय सोच रखने वाले कलाकार को फ्रीडम ऑफ स्पीच के नाम पर पुरस्कृत किया जाता है, वहां की पत्रकारिता की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है। हालेराकर ने पीएम मोदी की वेशभूषा को फटी-पुरानी और उन्हें एक सपेरे के लुक में दिखा कर अपनी घोर विकृत मानसिकता का प्रदर्शन किया है।

पत्रकारिता की आड़ में नफरत का एजेंडा इस अखबार में भारत के खिलाफ लेख लिखने वाले मुख्य समीक्षा फ्रैंक रोसाविक हैं। रोसाविक, जो खुद को वैश्विक मामलों का विशेषज्ञ बताते हैं, अक्सर ट्रंप या पुतिन जैसे नेताओं के लिए नरम रुख रखते हैं, लेकिन जब बात भारत और पीएम मोदी की आती है, तो उनकी लेखनी से नफरत और नस्लवाद झलकने लगता है। यह वही पुरानी औपनिवेशिक सोच है, जो भारत को हमेशा पिछड़ा और सपेरों का देश समझने की भूल करती है।

स्वयं जागरूक नागरिक ने उठाया बीड़ा इस अपमानजनक कृत्य के खिलाफ देश के एक स्वाभिमानी नागरिक और चार्टर्ड अकाउंटेंट बी.एल. टेकरीवाल ने आवाज उठाई है। उन्होंने नॉर्वे में स्थित भारतीय दूतावास को एक पत्र लिखकर नॉर्वे सरकार के समक्ष इस मुद्दे को सख्ती से उठाने का आग्रह किया है। टेकरीवाल का तर्क है कि भारत अब सांप-सपेरों का देश नहीं, बल्कि तकनीक और अर्थशास्त्र की दुनिया में वैश्विक नेतृत्व करने वाला राष्ट्र है।

क्या अब भी चुप रहेंगे डिजाइनर पत्रकार? यह प्रश्न उन भारतीय पत्रकारों के लिए भी है जो अक्सर पश्चिमी देशों की पत्रकारिता को अपना रोल मॉडल मानते हैं। क्या प्रधानमंत्री पर हुई इस रंगभेदी टिप्पणी के बाद भी वे वैचारिक विरोध के नशे में डूबे रहेंगे? यदि हम अपने देश के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए एकजुट नहीं हो सकते, तो यह हमारी सामूहिक विफलता है।

पश्चिमी भ्रम को तोड़ने का समय मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा था कि व्यक्ति का मूल्य उसकी चमड़ी के रंग से नहीं, बल्कि उसके चरित्र से तय होना चाहिए। नॉर्वे के इन तथाकथित पत्रकारों को यह समझना होगा कि भारत अब चुपचाप अपमान सहने वाला राष्ट्र नहीं है। 100 अरब डॉलर के निवेश की आकांक्षा रखने वाले देशों को यह भी याद रखना होगा कि भारत का सम्मान सर्वोपरि है। अब समय आ गया है कि इस संकीर्ण और नस्लवादी मानसिकता को तथ्यों और मजबूती के साथ चुनौती दी जाए।

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