पश्चिम बंगाल: मदरसों में वंदे मातरम अनिवार्य, विवादों के घेरे में सरकार का बड़ा फैसला
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पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के सभी सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और मान्यता प्राप्त मदरसों में प्रार्थना सभा के दौरान वंदे मातरम गाना अनिवार्य कर दिया है। मदरसा शिक्षा निदेशालय द्वारा 19 मई 2026 को जारी किए गए इस आदेश के बाद से राज्य की राजनीति गरमा गई है।

आदेश में क्या है? इस नए निर्देश के अनुसार, मदरसों के लिए सभी पुराने आदेशों को दरकिनार कर अब पढ़ाई शुरू होने से पहले वंदे मातरम का गायन अनिवार्य होगा। राज्य में बीजेपी की नई सरकार के इस कदम को जहां राष्ट्रवाद से जोड़कर देखा जा रहा है, वहीं विपक्षी दल इसे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं पर सीधा हमला बता रहे हैं।

मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं का कड़ा विरोध विभिन्न मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने इस फरमान को थोपने वाला बताया है। कोलकाता खिलाफत कमेटी के प्रमुख मोहम्मद अशरफ अली कासमी ने कहा कि सरकार किसी एक धर्म के एजेंडे पर नहीं चल सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लाम में पूजा केवल अल्लाह की होती है, इसलिए किसी अन्य के सामने वंदना करना उनके धार्मिक विश्वास के विरुद्ध है।

AIMIM नेता वारिस पठान ने भी सुर मिलाते हुए कहा कि वे जन गण मन पर गर्व महसूस करते हैं, लेकिन वंदे मातरम की कुछ पंक्तियाँ इस्लाम के सिद्धांतों से मेल नहीं खातीं। उन्होंने चेतावनी दी कि किसी पर राष्ट्रवाद थोपकर उसे राष्ट्र विरोधी करार देना गलत है।

विपक्ष का हमला: ध्यान भटकाने की साजिश विपक्षी दलों ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। सीपीआईएम के सुजन चक्रवर्ती ने कहा कि टीएमसी सरकार शिक्षा प्रणाली की विफलता से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे विवादित मुद्दों को हवा दे रही है। वहीं, आम जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर ने दो टूक कहा कि मदरसे मुसलमानों के चंदे से चलते हैं, इसलिए सरकार को उनके संचालन में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।

बीजेपी का रुख: राष्ट्रगीत पर विवाद कैसा? इस पूरे मामले पर बीजेपी का रुख आक्रामक है। पार्टी नेता केया घोष ने कहा कि वंदे मातरम राष्ट्रीय गीत है और इसे हर जगह गाया जाना चाहिए। उन्होंने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, उन्हें भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं है। वहीं, मुख्तार अब्बास नकवी ने अपील की है कि इस मुद्दे पर सांप्रदायिक माहौल बनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।

निष्कर्ष एक ओर सरकार इसे देशभक्ति का प्रतीक बताकर अनिवार्य बनाए रखना चाहती है, वहीं मुस्लिम समुदाय इसे अपनी धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार (संविधान अनुच्छेद 25) का हनन मान रहा है। यह आदेश अब आने वाले समय में एक बड़ी कानूनी और सामाजिक बहस का विषय बन सकता है।

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