अमेरिका-ईरान शांति वार्ता में बड़ा ट्विस्ट: पाकिस्तान बना बैकचैनल का मास्टरमाइंड, क्या टलेगा महायुद्ध?
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मध्य पूर्व (Middle East) में पिछले 40 दिनों से मंडरा रहे युद्ध के बादलों के बीच एक चौंकाने वाला कूटनीतिक मोड़ सामने आया है। दशकों से एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे अमेरिका और ईरान के बीच एक मेगा डील पर बातचीत तेज़ हो गई है, जिसने वैश्विक राजनीति के समीकरण बदल दिए हैं।

14-सूत्रीय प्रस्ताव और व्हाइट हाउस का नया दांव इस घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब तेहरान ने वाशिंगटन को एक गोपनीय 14-सूत्रीय प्रस्ताव भेजा। उम्मीद के विपरीत, डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने इस पर कड़ा रुख अपनाने के बजाय एक विस्तृत जवाबी प्रस्ताव सौंपा है। यह संकेत है कि अमेरिका क्षेत्र में जारी तनाव को शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त करने के मूड में है।

$25 बिलियन का फंड और होर्मुज़ से पाबंदियों का सस्पेंस इस शांति ढांचे के तहत अमेरिका ने ईरान के जब्त किए गए करीब $25 बिलियन (25 अरब डॉलर) के फंड को जारी करने का बड़ा दांव खेला है। साथ ही, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जुड़ी आर्थिक पाबंदियों में ढील देने की पेशकश भी की गई है। हालांकि, इस उदारता के पीछे की छिपी हुई शर्तों पर अभी संशय बरकरार है।

परमाणु चक्रव्यूह: 3.67% का कड़ा दायरा अमेरिका की मुख्य शर्त ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर केंद्रित है। वाशिंगटन चाहता है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) को 3.67% की सीमा तक सीमित रखे। इसके साथ ही, ईरान को अपने संवर्धित यूरेनियम के भंडार को देश से बाहर भेजना पड़ सकता है। तेहरान फिलहाल इस प्रस्ताव के हर बिंदु की बारीकी से समीक्षा कर रहा है।

पाकिस्तान की एंट्री: कूटनीतिक मध्यस्थ की भूमिका इस पूरी डील में पाकिस्तान का बैकचैनल खिलाड़ी के रूप में उभरना सबसे हैरान करने वाला पहलू है। गंभीर आर्थिक संकट में होने के बावजूद, पाकिस्तान वाशिंगटन और तेहरान के बीच संवाद को सुगम बनाने की अहम भूमिका निभा रहा है। अविश्वास की खाई को पाटने की यह कोशिश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए ध्रुवीकरण को जन्म दे रही है।

ट्रम्प की चेतावनी और भविष्य की अनिश्चितता कूटनीतिक प्रयासों के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने साफ कर दिया है कि यदि जल्द ही कोई ठोस नतीजा नहीं निकला, तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा। इस चेतावनी ने बातचीत की मेज पर दबाव को दोगुना कर दिया है। अब पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह कूटनीति मध्य पूर्व को महायुद्ध से बचा पाएगी या यह केवल संघर्ष विराम का एक छोटा अंतराल साबित होगा।

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