सनातन, ब्राह्मण और वोटबैंक की राजनीति: तमिलनाडु से यूपी तक नफरत का खेल
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सनातन विरोध की होड़ देश में इन दिनों सनातन धर्म और ब्राह्मण समाज के खिलाफ नफरत फैलाने की एक अजीब प्रतिस्पर्धा चल रही है। डीएमके, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के कई नेता मानो इस होड़ में हैं कि कौन सनातन के खिलाफ ज्यादा जहर उगलेगा और कौन ब्राह्मणों के लिए अधिक अभद्र भाषा का प्रयोग करेगा। तमिलनाडु से लेकर उत्तर प्रदेश तक, यह विवाद अब राजनीति के केंद्र में आ गया है।

कांग्रेस का सनातन विरोधी चेहरा तमिलनाडु में डीएमके की राह पर चलते हुए अब कांग्रेस ने भी सनातन को निशाने पर लिया है। कांग्रेस नेता जे.एम.एच. आसन मौलाना ने दावा किया है कि तमिलनाडु कभी सनातन धर्म को स्वीकार नहीं करेगा और राज्य में यह पहले ही खत्म हो चुका है। यह बयान उस उदयनिधि स्टालिन की याद दिलाता है, जिन्होंने सनातन की तुलना बीमारियों से की थी। हैरत की बात यह है कि उदयनिधि की माता दुर्गा स्टालिन स्वयं कट्टर सनातनी हैं और मंदिरों में पूजा करती हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके बेटे द्वारा सनातन के नाश की कामना करना राजनीतिक पाखंड को दर्शाता है।

यूपी में ब्राह्मणों को निशाना नफरत का यह दायरा सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के एक प्रवक्ता ने ब्राह्मण समाज के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया है। स्पष्ट है कि यह केवल वैचारिक मतभेद नहीं, बल्कि वोटबैंक की राजनीति है। द्रविड़ विचारधारा और सामाजिक न्याय के नाम पर सनातन को नीचा दिखाकर कुछ दल अपनी सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

सीएम विजय का सॉफ्ट सरेंडर तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री विजय अपनी सरकार के पहले ही दिन प्रेशर टेस्ट में फेल होते दिखे। उन्होंने अपने ज्योतिषी राधन पंडित वेट्रिवेल को अपना विशेष कार्य अधिकारी (OSD) नियुक्त किया था। लेकिन, एलीट क्लास के सनातन विरोधियों और वामपंथी दलों के दबाव में आकर मुख्यमंत्री को 24 घंटे के भीतर अपने फैसले से पीछे हटना पड़ा और ज्योतिषी को पद से हटाना पड़ा।

फ्लोर टेस्ट में पास, सिद्धांतों में फेल? विधानसभा में फ्लोर टेस्ट जीतने के बाद मुख्यमंत्री विजय ने यह ऐलान कर दिया कि उनकी सरकार अल्पसंख्यकों की सरकार है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय ने सनातन विरोधी एजेंडे के सामने घुटने टेक दिए हैं। सरदार पटेल ने कहा था कि राष्ट्र की एकता विश्वास और सहयोग से बनती है, लेकिन आज की राजनीति नफरत और विभाजन को अपना हथियार बना रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार तमिलनाडु में 87 प्रतिशत हिंदू हैं, फिर भी वहां की राजनीति में सनातन को हाशिए पर धकेलने का प्रयास जारी है।

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