अंतरिक्ष में भारत की रॉकेट वुमन की साड़ी: अब अमेरिका के म्यूजियम में हमेशा के लिए होगी कैद
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वॉशिंगटन डी.सी.: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की प्रमुख वैज्ञानिक नंदिनी हरिनाथ की एक साड़ी अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई है। अमेरिका के मशहूर स्मिथसोनियन नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूजियम ने उनकी एक साड़ी को अपने स्थायी संग्रह (Permanent Collection) का हिस्सा बनाया है। यह वही साड़ी है जिसे उन्होंने भारत के ऐतिहासिक मंगलयान (Mars Orbiter Mission) के सफल प्रक्षेपण के समय पहना था।

आखिर यह साड़ी इतनी खास क्यों है?

स्मिथसोनियन म्यूजियम ने इस साड़ी को भारत की रॉकेट वुमन की पहचान और अंतरिक्ष में देश की कामयाबी के प्रतीक के रूप में प्रदर्शित किया है। म्यूजियम के अनुसार, यह साड़ी उस ऐतिहासिक दिन पहनी गई थी जब भारत का अंतरिक्ष यान पृथ्वी की कक्षा को छोड़कर मंगल की 300 दिनों की लंबी यात्रा पर निकला था।

मंगलायन मिशन और नंदिनी की भूमिका

नंदिनी हरिनाथ इस ऐतिहासिक मिशन की उप-ऑपरेशनल डायरेक्टर थीं। उन्होंने मिशन की प्लानिंग और ऑपरेशन में अहम भूमिका निभाई थी। मंगलयान मिशन मूल रूप से 6-10 महीने के लिए था, लेकिन इसने लगभग 8 साल तक सफलतापूर्वक काम किया। इस मिशन ने भारत को मंगल ग्रह तक पहुंचने वाला पहला एशियाई देश और दुनिया का चौथा देश बनाया।

इंजीनियरिंग से इसरो तक का सफर

नंदिनी का बचपन विज्ञान और अंतरिक्ष के सपनों के बीच बीता। उनकी मां गणित की शिक्षिका थीं और पिता इंजीनियर थे। बचपन में स्टार ट्रेक शो और अपोलो 13 फिल्म ने उन्हें इस कदर प्रभावित किया कि उन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान को ही अपना लक्ष्य बना लिया। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने इसरो जॉइन किया।

20 साल का शानदार करियर

अपने दो दशक से अधिक के करियर में, नंदिनी ने इसरो के 14 से अधिक मिशनों में योगदान दिया है। मंगलयान को वह अपने करियर का सबसे खास प्रोजेक्ट मानती हैं क्योंकि उस समय पूरी दुनिया की निगाहें भारत पर टिकी थीं। नासा से मिली बधाई और अंतरराष्ट्रीय सराहना ने इस मिशन को वैज्ञानिकों के साथ-साथ आम जनता के लिए भी एक बड़ी प्रेरणा बना दिया।

वैश्विक मंच पर भारत का डंका

यह साड़ी केवल एक परिधान नहीं, बल्कि भारत की उस वैज्ञानिक क्षमता का प्रतीक है, जिसने पूरी दुनिया को कम लागत में अंतरिक्ष अन्वेषण की ताकत दिखाई। आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस साड़ी का म्यूजियम में होना यह साबित करता है कि भारतीय वैज्ञानिकों का काम दुनिया भर के लिए न केवल प्रेरणा का स्रोत है, बल्कि अमर भी है।

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