संसद में वंदे मातरम : ओवैसी का तीखा विरोध, बोले- यह किसी देवी की स्तुति, राष्ट्रगान नहीं
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हैदराबाद के सांसद और एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक बार फिर वंदे मातरम को लेकर विवादित टिप्पणी की है। उन्होंने संसद में इस गीत को गाने पर आपत्ति जताते हुए इसे सभी धर्मों के लिए अनुचित करार दिया है।

संसद है सभी धर्मों का मिलन स्थल एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ओवैसी ने तर्क दिया कि संसद एक ऐसी जगह है जहाँ सभी धार्मिक समुदायों के लोग आते हैं। ऐसे में वहां वंदे मातरम जैसे गीत का गायन उचित नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि संविधान सभा के दौरान भी प्रस्तावना (Preamble) की शुरुआत को लेकर चर्चा हुई थी, जिसमें किसी देवी के नाम का उल्लेख करने का सुझाव दिया गया था।

देश किसी देवी-देवता की मिल्कियत नहीं ओवैसी ने तीखे तेवर अपनाते हुए कहा, इस देश का नाम किसी देवी या देवता के नाम पर नहीं रखा गया है। यह देश किसी एक समुदाय, धर्म या किसी देवी-देवता की मिल्कियत नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि भारत की खूबसूरती इसमें है कि यह उन लोगों का भी सम्मान करता है जो किसी ईश्वर को नहीं मानते। इसी आधार पर उन्होंने वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समकक्ष मानने से इनकार कर दिया।

भाजपा का पलटवार: बौद्धिक रूप से बेईमान ओवैसी के इस बयान पर भाजपा ने कड़ी नाराजगी जताई है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुग ने ओवैसी पर हमला बोलते हुए कहा, वंदे मातरम 150 से अधिक वर्षों से हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का उद्घोष रहा है। यह अंग्रेजों के खिलाफ एक मंत्र की तरह था।

चुग ने आगे कहा कि जो लोग वंदे मातरम का विरोध करते हैं, वे बौद्धिक रूप से बेईमान और देश की भावना को नहीं समझने वाले हैं। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम का सम्मान करना भारत के हर नागरिक के लिए गर्व का विषय है, न कि केवल कोई सरकारी आदेश।

विवाद के पीछे की जड़ यह पहली बार नहीं है जब ओवैसी ने वंदे मातरम को लेकर सवाल उठाए हैं। उनके बयानों से अक्सर राजनीतिक गलियारों में गरमाहट आ जाती है। जहां एक पक्ष इसे देश की आजादी के संघर्ष और गौरव का प्रतीक मानता है, वहीं ओवैसी इसे धार्मिक मान्यताओं से जोड़कर विरोध दर्ज कराते रहे हैं। यह बहस एक बार फिर भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और राष्ट्रवाद की परिभाषा के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गई है।

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