केरल विधानसभा का नया चेहरा: अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व बढ़ा, हिंदू विधायकों की संख्या घटी
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केरल विधानसभा चुनावों के परिणाम ने राज्य की राजनीतिक तस्वीर बदल दी है। 140 सदस्यीय विधानसभा में पहली बार ऐसा हुआ है कि अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक विधायक संख्या के मामले में बराबर (50-50) हो गए हैं। राज्य की कुल आबादी में 55% हिस्सेदारी रखने वाले हिंदू समुदाय के विधायकों की संख्या घटकर 70 रह गई है।

अंकगणित और प्रतिनिधित्व का असंतुलन आंकड़ों पर गौर करें तो राज्य की 55% हिंदू आबादी के मुकाबले विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व अब घटकर 50% पर आ गया है। वहीं, 27% मुस्लिम आबादी के 35 विधायक और 18% ईसाई आबादी के भी 35 विधायक चुनकर आए हैं। इस प्रकार, कुल 70 विधायक अल्पसंख्यक समुदायों से हैं। यदि तुलना की जाए, तो अपनी आबादी के अनुपात में ईसाई समुदाय प्रतिनिधित्व के मामले में सबसे लाभप्रद स्थिति में है।

सरकार में अल्पसंख्यकों का दबदबा सत्ताधारी गठबंधन (UDF) की स्थिति और भी स्पष्ट है। 102 सीटें जीतने वाले इस गठबंधन में हिंदू विधायक मात्र 42 हैं, जबकि मुस्लिम और ईसाई समुदायों के कुल 60 विधायक शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि सरकार में लगभग 59% विधायक अल्पसंख्यक समुदायों से आते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सत्ता में हिंदुओं के इस अल्पमत का असर भविष्य में सरकारी नीतियों पर भी पड़ सकता है।

2021 से तुलना: बदलता ग्राफ पिछले पांच वर्षों में चुनावी समीकरण तेजी से बदले हैं। 2021 के विधानसभा चुनावों में हिंदू विधायकों की संख्या 78 थी, जो अब घटकर 70 रह गई है। यानी केवल पांच वर्षों में 8 हिंदू विधायक कम हुए हैं, जबकि ठीक उतनी ही संख्या में अल्पसंख्यक विधायकों का आंकड़ा बढ़ गया है।

प्रोपेगेंडा और कुंठा क्लब पर उठते सवाल यह परिणाम उन लोगों पर गंभीर सवाल खड़े करता है जो अक्सर देश भर में बहुसंख्यकवाद का तर्क देते हैं और अल्पसंख्यकों के घटते प्रतिनिधित्व का दावा करते हैं। आलोचकों का कहना है कि जो लोग अन्य राज्यों में अल्पसंख्यकों की कम भागीदारी पर रोते हैं, वे केरल के आंकड़ों पर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? क्या आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व का सिद्धांत केरल के संदर्भ में उन पर लागू नहीं होता?

जनता का फैसला सर्वोपरि स्पष्ट रहे कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों और उनके फैसले का सम्मान सर्वोपरि है। यह लेख किसी भी तरह से जनादेश को चुनौती नहीं देता है। हालांकि, यह उन दोहरे मानकों को उजागर करता है जिनसे अक्सर राजनीति और मीडिया के एक वर्ग द्वारा देश के जनसांख्यिकीय बदलावों को पेश किया जाता है। केरल विधानसभा की यह बदली हुई तस्वीर उन सभी के लिए एक आईना है जो एकतरफा नैरेटिव फैलाने में विश्वास रखते हैं।

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