I-PAC का पतन? चुनावी किंगमेकर से अब दूरी क्यों बना रही हैं पार्टियां
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भारतीय राजनीति में चुनावी किंगमेकर के तौर पर पहचानी जाने वाली कंसल्टेंसी फर्म इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (I-PAC) एक बार फिर चर्चा में है। समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा फर्म से नाता तोड़ लेने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या चुनावी गेम बदलने वाली इस कंपनी का जादू अब फीका पड़ रहा है?

प्रोफेशनल चुनावी मैनेजमेंट की शुरुआत

I-PAC की नींव 2013 में प्रशांत किशोर और उनकी टीम ने रखी थी। इसका मकसद राजनीति को डेटा-आधारित, प्रोफेशनल और माइक्रो-मैनेजमेंट के जरिए संचालित करना था। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए चाय पे चर्चा और 3D रैलियों के जरिए इसने चुनावी नैरेटिव सेट करने का नया फॉर्मूला पेश किया।

सफलताओं का ग्राफ और प्रशांत किशोर का साया

पिछले दो दशकों में इस फर्म ने नीतीश कुमार (बिहार), कैप्टन अमरिंदर सिंह (पंजाब), वाईएसआर कांग्रेस (आंध्र प्रदेश), ममता बनर्जी (बंगाल) और एमके स्टालिन (तमिलनाडु) के लिए चुनावी रणनीति तैयार की। 2021 तक प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत छवि ही इस कंपनी की सबसे बड़ी ताकत थी। हालांकि, उनके सक्रिय राजनीति में आने के बाद से कंपनी का नेतृत्व अब प्रतीक जैन, ऋषि राज सिंह और विनेश चंदेल की टीम कर रही है।

कमाई और काम करने का तरीका

I-PAC महज पीआर एजेंसी नहीं है। यह डेटा एनालिसिस, वोटर प्रोफाइलिंग, बूथ लेवल मैनेजमेंट और उम्मीदवार की ब्रांडिंग का पूरा इकोसिस्टम संभालती है। इसके बदले में पार्टियां उन्हें मोटी फीस देती हैं। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ऐसी कंपनियां प्रति सीट लाखों से करोड़ों रुपये तक चार्ज करती हैं।

विवादों के घेरे में किंगमेकर

कंपनी पर अब गंभीर आरोप लग रहे हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कंपनी पर मनी लॉन्ड्रिंग और कोयला तस्करी से जुड़ी हवाला राशि के लेन-देन के आरोप लगाए हैं। हाल ही में कंपनी के निदेशक विनेश चंदेल की गिरफ्तारी और राजस्व में 35% की गिरावट ने कंपनी की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि I-PAC स्वतंत्र सलाहकार न रहकर किसी पार्टी की एक शाखा की तरह काम कर रही है।

क्या I-PAC का प्रभाव घट रहा है?

सपा का किनारा करना केवल एक फैसला नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के बदलते नजरिए का संकेत है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशांत किशोर के हटने के बाद से कंपनी में एक लीडरशिप वैक्यूम पैदा हुआ है। बंगाल और तमिलनाडु में हालिया चुनावी नतीजों और लगातार बढ़ते कानूनी विवादों के कारण अब पार्टियों का इस फर्म पर भरोसा डगमगाने लगा है।

क्या यह किसी बड़े युग का अंत है? यह आने वाले समय के चुनावी परिणामों से साफ हो जाएगा।

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