पश्चिम बंगाल में चुनावी शोर अब अपने चरम पर है। बीजेपी के लिए यह महज एक राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि स्वाभिमान की परीक्षा बन चुका है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के शब्दों में कहें तो, देश के 21 राज्यों में सरकार होने के बावजूद प्रधानमंत्री और पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए बंगाल का लक्ष्य अभी अधूरा है। लेकिन क्या ममता बनर्जी के इस गढ़ को भेदना उतना ही आसान है जितना दिखता है?
बीजेपी के सामने सबसे बड़ी बाधा एक सर्वसम्मत चेहरे की कमी है। दिल्ली और अन्य राज्यों की तर्ज पर पार्टी पीएम मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन बंगाल में ममता बनर्जी की जन-नेता वाली छवि के सामने यह दांव कितना कारगर होगा, यह बड़ा सवाल है। जानकारों का मानना है कि इस बार बीजेपी ने अपनी रणनीति बदली है। रैलियों के शोर के बजाय अब पॉकेट-वाइज माइक्रो-मैनेजमेंट और साइलेंट कैंपेनिंग पर जोर दिया जा रहा है।
संगठनात्मक मोर्चे पर बीजेपी को अभी भी टीएमसी से कड़ी चुनौती मिल रही है। सीनियर नेताओं सुवेंदु अधिकारी, सुकांत मजूमदार, दिलीप घोष और सौमित्र खान के बीच की केमिस्ट्री अक्सर सार्वजनिक रूप से मतभेदों में बदल जाती है। पार्टी के भीतर पुराने बनाम नए का द्वंद्व भी जारी है, जिसे सुलझाने के लिए आलाकमान को लगातार हस्तक्षेप करना पड़ रहा है।
बीजेपी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हिंसा और घुसपैठ को बड़ा चुनावी मुद्दा बना रही है। हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि सीमावर्ती जिलों में घुसपैठ एक लंबे समय से सिस्टम का हिस्सा बन चुकी है, जिससे रातों-रात निपटना संभव नहीं है। साथ ही, बंगाल में जाति और धर्म के बजाय लोक-लुभावन योजनाओं का प्रभाव अभी भी अधिक है, जिसे देखते हुए ममता बनर्जी ने भी दुर्गा आंगन और जगन्नाथ धाम जैसे सांस्कृतिक प्रोजेक्ट्स के जरिए हिंदुओं को साधने की कोशिश की है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने ने चुनावी तपिश बढ़ा दी है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इसे लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। ममता बनर्जी ने इसे स्ट्रीट फाइटर की तरह लड़ा है, जिससे उन्हें अल्पसंख्यकों और प्रभावित वोटरों की सहानुभूति मिलने की उम्मीद है। वहीं, बीजेपी का आरोप है कि ये नाम अवैध अप्रवासियों के थे।
अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे को लेकर लगाई जा रही अटकलों पर स्थिति फिलहाल स्पष्ट है। कांग्रेस, लेफ्ट या AIMIM जैसे दल टीएमसी के मजबूत आधार को हिलाते नहीं दिख रहे। बंगाल का मुस्लिम समुदाय फिलहाल टीएमसी के साथ लामबंद है, क्योंकि उन्हें पता है कि विकल्प के अभाव में ममता ही बीजेपी को रोकने का इकलौता जरिया हैं।
हुमायूं कबीर की पार्टी का वायरल वीडियो और उससे जुड़े विवादों ने भी हवा का रुख मोड़ने की कोशिश की, लेकिन ग्राउंड रियलिटी यही है कि मुकाबला आज भी मुख्य रूप से ममता बनाम बीजेपी के बीच ही फंसा हुआ है। अब देखना यह है कि मतदान के दिन जनता का रुख किस करवट बैठता है।
पश्चिम बंगाल चुनाव के बीच हुमायूँ कबीर का सनसनीखेज वीडियो
— Ravi Pandey🇮🇳 (@ravipandey2643) April 9, 2026
हुमायूँ कबीर ने BJP से 200 करोड़ रुपये की अग्रिम राशि की मांग की।
मुसलमानों को बेवकूफ़ बनाना आसान है, -हुमायूँ
बाबरी मस्जिद बने न बने लेकिन हमारा काम हो जाएगा- हुमायूँ#humayunkabir #WestBengalAssemblyElection2026 #TMC pic.twitter.com/xlOyKkfDgk
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