होर्मुज़ संकट के बीच ट्रंप का ‘न्यूक्लियर डस्ट’ दांव: क्या वाकई करीब है अमेरिका-ईरान शांति समझौता?
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा है कि ईरान अपने एनरिच्ड यूरेनियम भंडार को सौंपने के लिए तैयार हो गया है। व्हाइट हाउस में ट्रंप ने इसे न्यूक्लियर डस्ट की संज्ञा दी, जो इस बात का संकेत है कि अमेरिका इसे परमाणु हथियारों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाला बड़ा खतरा मानता है। ट्रंप के अनुसार, दोनों देशों के बीच शांति समझौते की संभावना अब पहले से कहीं अधिक प्रबल है।

इस्लामाबाद वार्ता: 21 घंटे की मैराथन, फिर भी नतीजे शून्य ट्रंप के दावे के बावजूद जमीनी हकीकत फिलहाल पेचीदा बनी हुई है। हाल ही में इस्लामाबाद में दोनों देशों के बीच 21 घंटे लंबी वार्ता हुई, जो किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी। विवाद का मुख्य बिंदु यूरेनियम संवर्धन की समय सीमा है। अमेरिका ने ईरान के सामने 20 साल तक संवर्धन पर रोक का प्रस्ताव रखा है, जबकि ईरान केवल 5 साल तक ही मानने को तैयार है।

अविश्वास की खाई और संप्रभुता का मुद्दा परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच दशकों पुराना अविश्वास अब भी बरकरार है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि संवर्धन की प्रक्रिया परमाणु हथियारों की ओर पहला कदम है, इसलिए वे इसे पूरी तरह समाप्त करना चाहते हैं। दूसरी ओर, ईरान इसे अपनी संप्रभुता और ऊर्जा जरूरतों का अधिकार बताता है। यही वह बुनियादी मतभेद है जो किसी भी समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा ट्रंप ने अपने बयान में स्पष्ट किया है कि समझौते की स्थिति में होर्मुज़ जलडमरूमध्य खुला रहेगा और तेल की वैश्विक आपूर्ति निर्बाध बनी रहेगी। इससे साफ है कि इस कूटनीतिक खेल के पीछे सिर्फ परमाणु मुद्दा नहीं है, बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा की डोर भी जुड़ी हुई है। ईरान के सैन्य कमांडर अली अब्दुल्लाही की पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल असीम मुनीर से हालिया मुलाकात भी इसी दिशा में एक रणनीतिक संकेत मानी जा रही है।

क्या यह कूटनीतिक जीत है या महज राजनीतिक चाल? ट्रंप के इस दावे को अभी अंतिम सच्चाई मान लेना जल्दबाजी होगी। जब तक दोनों पक्ष यूरेनियम संवर्धन की अवधि और अंतरराष्ट्रीय निगरानी को लेकर किसी साझा बिंदु पर नहीं आते, तब तक इसे केवल एक रणनीतिक दबाव बनाने की कोशिश माना जा सकता है। फिलहाल, पूरी दुनिया इस बात पर टिकी है कि क्या यह बयान वाकई किसी बड़े बदलाव की शुरुआत है या फिर कूटनीति के पन्नों पर लिखा गया महज एक और अध्याय।

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