नोएडा में अशांति की साजिश : पहले मजदूर, अब मेड का हंगामा, क्या है हिंसा के पीछे का DNA ?
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नोएडा के सेक्टर 121 स्थित क्लियो काउंटी सोसायटी के बाहर मंगलवार सुबह जो नजारा दिखा, उसने हर किसी को हैरान कर दिया। सुख-शांति से रहने वाले इस पॉश इलाके के बाहर का माहौल अचानक रणक्षेत्र में बदल गया। घरों में काम करने वाली मेड (घरेलू सहायिकाओं) ने वेतन बढ़ोतरी और छुट्टी की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू किया, जो देखते ही देखते पत्थरबाजी में तब्दील हो गया। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।

क्या यह महज वेतन का मुद्दा है? एक दिन पहले मजदूरों का प्रदर्शन और अगले दिन मेड का सड़कों पर उतरना, क्या यह सिर्फ एक संयोग है? नोएडा औद्योगिक शहर है, जहां मेहनत करने वालों को उचित सम्मान मिलना चाहिए। लेकिन, सवाल यह उठता है कि क्या वेतन की मांग के नाम पर हिंसा करना जायज है? जिस तरह से अचानक संगठित होकर प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हुआ है, वह नोएडा की शांति को अस्थिर करने के किसी सुनियोजित प्रयास की तरफ इशारा करता है।

मेड की सैलरी: नियम बनाम आपसी सहमति फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों का वेतन सरकार तय करती है, लेकिन घरेलू सहायिकाओं का मेहनताना पूरी तरह से मालिक और काम करने वाले के बीच आपसी सहमति पर आधारित होता है। यदि मेड को लगता है कि उन्हें कम वेतन मिल रहा है, तो उनके पास काम छोड़ने का विकल्प होता है। लेकिन, नोएडा की इस सोसायटी में मेड यह मांग कर रही हैं कि उन्हें भी फैक्ट्री मजदूरों के बराबर वेतन और सुविधाएं मिलें, जो मौजूदा आर्थिक ढांचे में एक जटिल और अव्यवहारिक मांग है।

साजिश या प्रोपेगेंडा का शिकार? आशंका जताई जा रही है कि कुछ बाहरी तत्व इन घरेलू सहायिकाओं को बहका रहे हैं। प्रदर्शन के दौरान पत्थर चलाने वाले वे लोग कौन थे, जो घर संभालने वाली महिलाओं के हाथों में पत्थर थमा रहे थे? प्रशासन के अनुसार, अफवाहें फैलाकर सुनियोजित तरीके से नोएडा के औद्योगिक माहौल को खराब करने की कोशिश की जा रही है। क्या मजदूरी की मांग की आड़ में अराजकता का माहौल तैयार किया जा रहा है?

क्या कहता है कोर्ट और कानून? घरेलू कामगारों के न्यूनतम वेतन का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि यह सिर्फ अधिकारों का मामला नहीं है, बल्कि इसके गहरे सामाजिक और आर्थिक प्रभाव हैं। महानगरों की कार्यप्रणाली मांग और आपूर्ति पर टिकी होती है, जहां मेड एक साथ कई घरों में काम करती हैं। दशकों से चली आ रही इस व्यवस्था में अचानक आई यह आक्रामकता किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकती है।

नोएडा, जो उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का मुख्य इंजन है, वहां इस तरह की हिंसा अर्थव्यवस्था और सुरक्षा दोनों के लिए चिंता का विषय है। क्या समाज के इस वर्ग को बरगलाकर शहर को टारगेट बनाया जा रहा है? यह सवाल अब पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

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