प्रसिद्ध अमेरिकी राजनयिक हेनरी किसिंजर ने हमेशा कहा था कि मध्यस्थता के लिए केवल तटस्थता ही काफी नहीं है, बल्कि उसके पीछे एक शक्ति और स्थिरता की अनुभूति भी होनी चाहिए। इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता की विफलता ने इस कड़वे सच को एक बार फिर प्रमाणित कर दिया है।
पाकिस्तान ने करीब 55 साल बाद वैश्विक पटल पर एक औपचारिक मध्यस्थ की भूमिका निभाई। पाकिस्तान इस मौके को लेकर इतना उत्साहित था कि उसे लगा वह अमेरिका की नजर में फिर से प्रासंगिक हो गया है। लेकिन दुनिया जानती है कि जो देश खुद अपनी आंतरिक अस्थिरता और आतंकवाद के बोझ तले दबा हो, वह दूसरों के झगड़े सुलझाने का नाटक कैसे कर सकता है? जाहिर था, परिणाम वही हुआ जो होना तय था—पूर्ण विफलता।
इस्लामाबाद में वार्ता की विफलता पर भारत में बैठा एक धड़ा बेचैन है। ये वही लोग हैं जो पिछले 36 घंटों से सोशल मीडिया पर भारतीय मीडिया को निशाना बना रहे हैं। उनकी कुंठा यह है कि इंडियन मीडिया इस विफलता पर जश्न क्यों नहीं मना रहा? या मीडिया खुश क्यों है?
हकीकत यह है कि मीडिया खुश नहीं है, बल्कि इस बात को उजागर कर रहा है कि एक आतंक समर्थक देश से शांति वार्ता की उम्मीद करना ही बौद्धिक दिवालियापन है। राजद नेता मनोज झा जैसे लोग इसे राष्ट्रीय चेतना के गिरते स्तर से जोड़ रहे हैं, जबकि उन्हें यह समझना चाहिए कि जब मध्यस्थ की साख ही शून्य हो, तो वार्ता की सफलता की संभावना भी शून्य ही होती है।
जिस देश की सेना अपने ही घर में बलूच विद्रोहियों और तालिबान से पिट रही हो, वह वैश्विक शांति का सेतु कैसे बनेगा? जेडी वेंस के पाकिस्तान से निकलते ही बलूच विद्रोहियों ने पाकिस्तानी तटरक्षक बल पर हमला कर तीन लोगों को मार गिराया। जिस देश की सीमाएं सुरक्षित न हों, और जहां गृहयुद्ध जैसे हालात हों, वहां बैठकर शांति की बात करना केवल एक भद्दा मजाक है।
महबूबा मुफ्ती जैसे नेताओं का यह कहना कि वे इसे विफल वार्ता नहीं मानतीं , केवल वास्तविकता से मुंह छिपाने जैसा है। कार्ल सेगन ने कहा था कि भ्रम में जीने से बेहतर है सच्चाई को स्वीकार करना। पाकिस्तान की मध्यस्थता का विफल होना कोई संयोग नहीं, बल्कि पाकिस्तान की अपनी कूटनीतिक कमजोरी है।
भारत का मीडिया किसी की विफलता पर नाच नहीं रहा है। भारतीय मीडिया केवल यह दिखा रहा है कि एक आतंकी देश, जो वैश्विक अस्थिरता का केंद्र है, यदि खुद को शांति का मसीहा पेश करेगा, तो उसका हश्र ऐसा ही होगा।
पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति रखने वाले इन साहित्यिक और वैचारिक समर्थकों को मीडिया पर उंगली उठाने के बजाय आत्ममंथन करना चाहिए। वे जिस पाकिस्तान के प्रेम में आकंठ डूबे हैं, वह देश आज अपनी पहचान और अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। सच्चाई यही है कि पाकिस्तान की विफलता पर रोना नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करना ही एकमात्र विकल्प है।
#DNAमित्रों | वार्ता नाकाम या PAK नाकाम..किस बात का दर्द?..48 घंटे पहले उछल रहे थे..24 घंटे से रो रहे हैं!
— Zee News (@ZeeNews) April 13, 2026
मुनीर फैन क्लब के असली दर्द का DNA टेस्ट#DNA #DNAWithRahulSinha #Pakistan #America #Iran @RahulSinhaTV pic.twitter.com/J78VfNWTu6
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