सदाबहार नग्मों की मल्लिका: आशा भोसले के अंतिम संस्कार में निभाई जाएंगी मराठी ब्राह्मण परंपराएं
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भारतीय संगीत जगत की सुर साम्राज्ञी और करोड़ों दिलों की धड़कन आशा भोसले का निधन एक युग का अंत है। उनके निधन से देशभर में शोक की लहर है। अब सभी की निगाहें उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पर टिकी हैं, जो पूरी तरह से पारंपरिक मराठी ब्राह्मण रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न की जाएगी।

अंतिम विदाई का समय और स्थान परिवार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, उनके पुत्र आनंद भोसले ने बताया कि अंतिम दर्शन के लिए पार्थिव शरीर को मुंबई के लोअर परेल स्थित कासा ग्रांडे में रखा जाएगा। उनका अंतिम संस्कार शनिवार, 12 अप्रैल की शाम 4 बजे शिवाजी पार्क श्मशान घाट पर पूरे राजकीय सम्मान और वैदिक परंपराओं के साथ किया जाएगा।

शरीर की शुद्धि: पहली प्रक्रिया मराठी ब्राह्मण परंपराओं के अनुसार, अंतिम संस्कार का पहला चरण शुद्धि है। पार्थिव शरीर को गंगाजल और पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद शरीर को नए वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दौरान माथे पर चंदन या कुमकुम का तिलक लगाया जाता है और मुख में तुलसी दल और गंगाजल रखा जाता है।

अंतिम यात्रा और वैदिक मंत्रोच्चार हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार, अर्थी को दक्षिण दिशा की ओर ले जाया जाता है, जिसे यम की दिशा माना गया है। यात्रा के दौरान राम नाम सत्य है का उद्घोष किया जाता है। मराठी ब्राह्मण समुदाय में वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ आत्मा की शांति की प्रार्थना की जाती है, जिनका उल्लेख ऋग्वेद जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।

मुखाग्नि: मोक्ष का मार्ग हिंदू मान्यताओं में दाह संस्कार को सोलह संस्कारों में से एक माना गया है। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार, निकटतम सगे-संबंधियों द्वारा दी गई मुखाग्नि आत्मा के मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। यह पूरी प्रक्रिया वैदिक ऋचाओं के बीच संपन्न होती है, जो मराठी ब्राह्मण संस्कृति की पहचान है।

अस्थि विसर्जन और श्राद्ध कर्म दाह संस्कार के बाद अस्थियों को एकत्र कर किसी पवित्र नदी में विसर्जित किया जाएगा। यह प्रक्रिया गरुड़ पुराण में वर्णित मोक्ष यात्रा का हिस्सा है। वहीं, मृत्यु के 10वें या 13वें दिन श्राद्ध और पिंडदान की प्रक्रिया होगी। मनुस्मृति के अनुसार, यह अनुष्ठान दिवंगत आत्मा की तृप्ति और उन्हें सम्मानजनक विदाई देने के लिए अनिवार्य माना गया है।

आशा भोसले का जाना एक ऐसी क्षति है जिसे भरा नहीं जा सकता, लेकिन उनकी यादें और उनके द्वारा गाए गए कालजयी भजन हमेशा संगीत प्रेमियों के कानों में रस घोलते रहेंगे।

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