लेबनान के लिए आखिर क्यों ढाल बना है ईरान? शांति वार्ता में अमेरिका से सीधी टक्कर की असली वजह
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हाल ही में इस्लामाबाद में हुई ईरान-अमेरिका शांति वार्ता में लेबनान का मुद्दा छाया रहा। ईरान ने अमेरिका के सामने दो टूक मांग रखी कि वह इजरायल पर दबाव बनाकर लेबनान में हमले रुकवाए। यह मांग चौंकाने वाली इसलिए है क्योंकि ईरान खुद इस वक्त कई मोर्चों पर कमजोर है और अपने कई शीर्ष नेताओं को खो चुका है।

आखिर ईरान की इस बेचैनी के पीछे क्या राज है? क्यों तेहरान के लिए लेबनान इतना महत्वपूर्ण है? इसके पीछे 5 प्रमुख रणनीतिक कारण हैं:

1. सुरक्षा ढांचे का अहम किला

ईरान खुद को पश्चिम एशिया की बड़ी ताकत बनाना चाहता है, और लेबनान इसके लिए एक मुफीद जगह है। भौगोलिक रूप से लेबनान इजरायल के काफी करीब है और भूमध्य सागर तक इसकी सीधी पहुंच है। ईरान इसे अपने सुरक्षा ढांचे का एक पिलर मानता है। यदि लेबनान अस्थिर होता है, तो तेहरान का क्षेत्रीय रसूख सीधे खतरे में पड़ जाता है।

2. हिजबुल्लाह: ईरान की प्रतिरोध नीति का आधार

लेबनान में सक्रिय हिजबुल्लाह संगठन ईरान का सबसे मजबूत मोहरा है। ईरान इसे महज एक सहयोगी नहीं, बल्कि अपनी प्रतिरोध नीति का हिस्सा मानता है। हिजबुल्लाह के जरिए ईरान इजरायल पर लगातार दबाव बनाए रखता है। अगर हिजबुल्लाह कमजोर होता है, तो क्षेत्र में ईरान की सैन्य और कूटनीतिक ताकत सीधे तौर पर आधी हो जाएगी।

3. इजरायल के खिलाफ संतुलन का खेल

ईरान और इजरायल के बीच दशकों से छद्म युद्ध चल रहा है। ईरान सीधे युद्ध के बजाय लेबनान जैसे देशों में अपने प्रभाव का इस्तेमाल इजरायल को घेरने के लिए करता है। लेबनान में तनाव का बने रहना ईरान के लिए एक सामरिक जरूरत है, लेकिन पूर्ण युद्ध उसके लिए घाटे का सौदा है। वह तनाव को नियंत्रित रखना चाहता है, न कि उसे हाथ से निकलने देना।

4. विचारधारा और सियासी पहचान

ईरान केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि वैचारिक दबदबा भी चाहता है। लेबनान का शिया समुदाय और वहां की राजनीति ईरान की विचारधारा का एक बड़ा केंद्र है। अगर लेबनान में उसके करीबी गुट हारते हैं या कमजोर पड़ते हैं, तो यह ईरान की वैचारिक साख पर बड़ा तमाचा होगा। ईरान लेबनान में अपनी सक्रियता को अपनी पहचान के रूप में देखता है।

5. एक चिंगारी जो पूरा क्षेत्र जला सकती है

ईरान यह अच्छी तरह जानता है कि लेबनान में भड़की आग सिर्फ बेरूत तक सीमित नहीं रहेगी। यह सीरिया से लेकर इराक और यमन तक फैल सकती है। इस समय ईरान खुद कई मोर्चों पर आंतरिक और बाहरी दबाव झेल रहा है। वह ऐसे किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध का जोखिम नहीं उठा सकता जिसमें अमेरिका सीधे तौर पर कूद पड़े।

निष्कर्ष: संक्षेप में कहें तो लेबनान ईरान के लिए कोई बाहरी मुल्क नहीं, बल्कि उसकी विदेश नीति की जीवनरेखा है। लेबनान की स्थिरता का मतलब है ईरान का क्षेत्र में बना रहना। यही वजह है कि तेहरान हर मंच पर लेबनान को ढाल बनाने की कोशिश करता है, क्योंकि वह जानता है कि लेबनान का जलना उसके अपने अस्तित्व की लपटों को और तेज कर देगा।

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