भारत ने दुनिया को दिखाया नया रास्ता: थोरियम तकनीक से बदलेगी वैश्विक ऊर्जा की तस्वीर
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नई दिल्ली: भारत ने सिविल न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक छलांग लगाई है। तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित 500 मेगावॉट क्षमता के स्वदेशी प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने क्रिटिकैलिटी हासिल कर ली है। यह उपलब्धि न केवल भारत के परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण की शुरुआत है, बल्कि यह देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने वाला एक बड़ा मील का पत्थर है।

क्यों खास है यह कामयाबी?

भारत के इस स्वदेशी रिएक्टर की सबसे बड़ी खासियत प्लूटोनियम और थोरियम का उपयोग करने की क्षमता है। वर्तमान में दुनिया के अधिकांश परमाणु रिएक्टर यूरेनियम पर निर्भर हैं, जो सीमित मात्रा में उपलब्ध है। भारत की यह सफलता अब थोरियम के उपयोग के द्वार खोल रही है, जिसके विशाल भंडार भारत में मौजूद हैं।

चीन-अमेरिका भी पीछे क्यों छूट रहे हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे प्रमुख ऊर्जा मार्गों पर भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटें वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा हैं। फास्ट ब्रीडर रिएक्टर न केवल ईंधन क्षमता बढ़ाते हैं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा भी सुनिश्चित करते हैं। वर्तमान में, थोरियम-प्लूटोनियम के उपयोग की तकनीक केवल रूस के पास थी, जिसमें अब भारत ने भी अपनी जगह बना ली है। अमेरिका और चीन जैसी बड़ी शक्तियां भी इस क्षेत्र में अभी भारत से पीछे चल रही हैं।

थोरियम: भारत का ब्रह्मास्त्र

थोरियम (Th-232) का उपयोग करना पारंपरिक यूरेनियम से काफी अलग और चुनौतीपूर्ण है। इसे सीधे परमाणु ईंधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, पहले इसे रिएक्टर के भीतर यूरेनियम-233 में बदलना पड़ता है। हालांकि, थोरियम के खनन की प्रक्रिया यूरेनियम की तुलना में अधिक सुरक्षित, कुशल और पर्यावरण के अनुकूल है।

दुनिया में सबसे बड़ा भंडार भारत के पास

थोरियम के भंडार के मामले में भारत दुनिया में नंबर वन है। चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के पास इसके नाममात्र के भंडार हैं। थोरियम की प्रचुरता यह सुनिश्चित करती है कि आने वाले दशकों में भारत की ऊर्जा जरूरतें न केवल पूरी होंगी, बल्कि देश वैश्विक स्तर पर एनर्जी लीडर के रूप में उभरेगा।

भविष्य की राह: चुनौतियां और संभावनाएं

थोरियम आधारित ऊर्जा का व्यावसायिक उपयोग अभी भी शोध और विकास (R&D) के निवेश पर निर्भर है। इसकी लागत को कम करना वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। हालांकि, कलपक्कम के PFBR की सफलता ने पूरी दुनिया को एक नई राह दिखाई है। भारत का लक्ष्य 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करना है, जो अब थोरियम के सहारे आसान नजर आ रहा है।

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