गगनयान की सुरक्षित वापसी का दमदार टेस्ट: ISRO और एयरफोर्स ने आसमान में दिखाया दम
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अपने बहुप्रतीक्षित मानव मिशन गगनयान के लिए तेजी से तैयारियां कर रहा है। इसी कड़ी में इसरो ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट (IADT-2) को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। यह परीक्षण अंतरिक्ष से लौटने वाले यात्रियों की सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चित करने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।

भारतीय वायुसेना का मिला साथ इस चुनौतीपूर्ण परीक्षण में भारतीय वायुसेना ने भी सहयोग दिया। वायुसेना के चिनूक हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करके क्रू मॉड्यूल को आसमान में ले जाया गया। आईएएफ ने अपने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि इस टेस्ट ने पैराशूट-आधारित डीसेलरेशन सिस्टम (गति धीमी करने वाली प्रणाली) की प्रभावशीलता को साबित कर दिया है।

कैसे काम करता है यह पैराशूट सिस्टम? टेस्ट के दौरान, 5.7 टन वजनी क्रू मॉड्यूल को चिनूक हेलीकॉप्टर से 3 किलोमीटर की ऊंचाई से बंगाल की खाड़ी के ऊपर छोड़ा गया। जैसे ही मॉड्यूल नीचे गिरा, एक-एक करके 10 पैराशूट तैनात किए गए। इन पैराशूटों ने न केवल मॉड्यूल की रफ्तार को नियंत्रित किया, बल्कि समुद्र में उसकी सुरक्षित स्पलैशडाउन (पानी में लैंडिंग) भी सुनिश्चित की।

इंजीनियरिंग का सटीक प्रदर्शन इसरो के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया एक जटिल कोरियोग्राफी की तरह थी। इंजीनियरों ने हर सेकंड मॉड्यूल की वेलोसिटी (गति) को ट्रैक किया। इस सफल परीक्षण के बाद भारतीय नौसेना ने एक समन्वित ऑपरेशन के जरिए मॉड्यूल को समुद्र से सुरक्षित बाहर निकाल लिया। यह अभ्यास इस बात की पुष्टि करता है कि अगर गगनयान मिशन के दौरान कोई आपातकालीन स्थिति आती है, तो पैराशूट सिस्टम उसे सुरक्षित बचा सकता है।

गगनयान मिशन के लिए बड़ा मील का पत्थर केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने इस सफलता पर इसरो की टीम को बधाई दी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि गगनयान मिशन अगले साल तक लॉन्च किया जा सकता है। यह परीक्षण एंड-टू-एंड परफॉर्मेंस को समझने में मददगार साबित हुआ है, जिससे अंतरिक्ष यात्रियों की वापसी को लेकर भरोसा और मजबूत हुआ है।

क्या होता है एयर ड्रॉप टेस्ट? एयर ड्रॉप टेस्ट का मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष यान की पृथ्वी पर वापसी के आखिरी चरण का अभ्यास करना है। इसमें हेलीकॉप्टर से कैप्सूल को गिराकर अलग-अलग स्थितियों का परीक्षण किया जाता है, जैसे:

बता दें कि पिछले साल अगस्त में हुए पहले IADT टेस्ट में 4.8 टन के डमी मॉड्यूल का परीक्षण किया गया था, जिसके बाद अब IADT-2 की सफलता ने गगनयान के रास्ते की एक बड़ी बाधा को दूर कर दिया है।

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