अलविदा लद्दाख के शेर : कारगिल के नायक कर्नल सोनम वांगचुक का निधन
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भारतीय सेना ने अपना एक जांबाज योद्धा खो दिया है। कारगिल युद्ध में अपनी वीरता का लोहा मनवाने वाले लद्दाख के शेर कर्नल सोनम वांगचुक (महावीर चक्र) का शुक्रवार सुबह लेह में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वे 61 वर्ष के थे।

भावपूर्ण श्रद्धांजलि उनके निधन की पुष्टि भारतीय सेना के पूर्व कमांडर कर्नल वाई.के. जोशी ने की। उन्होंने सोशल मीडिया पर दुख व्यक्त करते हुए लिखा, कर्नल सोनम वांगचुक के अचानक निधन से अत्यंत दुखी हूं। महावीर चक्र से सम्मानित यह वीर योद्धा कारगिल युद्ध के सच्चे नायक थे। उनकी निस्वार्थ सेवा और बहादुरी को देश हमेशा याद रखेगा।

बिना आर्टिलरी के किया था असंभव को मुमकिन कर्नल वांगचुक लद्दाख स्काउट्स के सबसे सम्मानित अधिकारियों में से एक थे। 30 मई 1999 को कारगिल संघर्ष के दौरान, उन्होंने एक युवा मेजर के रूप में चोरबत ला की दुर्जेय ऊंचाइयों पर तिरंगा फहराया था। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि उनके पास कोई आर्टिलरी सपोर्ट नहीं था, फिर भी उन्होंने दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

दुश्मन के छक्के छुड़ाए 28 से 30 मई 1999 के बीच कर्नल वांगचुक और उनके सैनिकों ने दुश्मन की एक मजबूत ऑब्जर्वेशन पोस्ट पर अचानक हमला किया। इस जांबाजी में उन्होंने 6 पाकिस्तानी घुसपैठियों को ढेर कर दिया। उनकी इसी अद्भुत युद्ध कुशलता के लिए उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से नवाजा गया।

इतिहास के पन्नों में अमर नाम उनकी वीरता का सम्मान करते हुए भारतीय सेना ने उस सेक्टर की दो महत्वपूर्ण सैन्य चौकियों का नाम सोनम 1 और सोनम 2 रखा है। यह सम्मान इस बात का गवाह है कि उनकी बहादुरी का लोहा आने वाली पीढ़ियाँ भी मानेंगी।

एक प्रेरणादायक सफर 27 जनवरी 1964 को जन्मे कर्नल वांगचुक का ताल्लुक एक अनुशासित परिवार से था। उनके पिता 14वें दलाई लामा के सुरक्षा अधिकारी थे। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद, वे 4 सितंबर 1987 को असम रेजिमेंट के जरिए सेना में शामिल हुए। आज एक वीर सैनिक के जाने से पूरा देश शोकाकुल है, लेकिन उनके पराक्रम की गाथाएं हमेशा अमर रहेंगी।

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