नोएडा से भी छोटा देश, भारत ने क्यों बिछाईं अपनी कूटनीतिक बिसात?
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नई दिल्ली: भारत सरकार ने हाल ही में कैरेबियाई देश सेंट किट्स एंड नेविस के साथ संबंधों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने नई दिल्ली में इस देश के हाई कमीशन का उद्घाटन किया। यह छोटा सा राष्ट्र आकार में नोएडा से भी थोड़ा सा बड़ा है, लेकिन भारत के लिए इसके कूटनीतिक मायने काफी गहरे हैं।

नोएडा से भी छोटा है यह देश सेंट किट्स एंड नेविस का कुल क्षेत्रफल केवल 261 वर्ग किलोमीटर है, जबकि नोएडा का विस्तार करीब 204 वर्ग किलोमीटर में है। 53,104 की आबादी वाला यह देश अमेरिकी महाद्वीपों में क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों में सबसे छोटा है। इसके पास अपनी रक्षा के लिए मात्र 300 सैनिकों की एक छोटी सी फौज है।

साझा इतिहास और लोकतंत्र के धागे विदेश मंत्री जयशंकर ने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के संबंध महज औपचारिक नहीं हैं। 1983 में राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद से ही भारत और सेंट किट्स ने उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई की साझा विरासत साझा की है। दोनों देशों के बीच लोकतंत्र के मूल्य और वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज बनने का साझा संकल्प है।

भारत का ITLOS दांव भारत की इस सक्रियता के पीछे एक बड़ा रणनीतिक कारण लॉ ऑफ द सी (ITLOS) है। भारत चाहता है कि इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल फॉर द लॉ ऑफ द सी में प्रोफेसर बिमल एन पटेल जज के तौर पर नियुक्त हों। भारत इस पद के लिए 2026-2035 के कार्यकाल हेतु सेंट किट्स जैसे देशों का समर्थन जुटा रहा है।

क्या है ITLOS का महत्व? यह ट्रिब्यूनल 1982 में समुद्र संबंधी कानूनों और विवादों को सुलझाने के लिए गठित किया गया था। इसका मुख्यालय जर्मनी के हैंबर्ग में है। 21 सदस्यीय इस निकाय में भारत 1995 से सक्रिय है। भारत के लिए समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने हितों की रक्षा करने हेतु इस ट्रिब्यूनल में अपनी उपस्थिति बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है।

पर्यावरण के प्रति सजग राष्ट्र सैन्य शक्ति में छोटा होने के बावजूद, सेंट किट्स एंड नेविस ने जलवायु परिवर्तन से निपटने में मिसाल पेश की है। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण समुद्र में डूबने के खतरे का सामना कर रहा यह देश, आज क्लाइमेट एक्शन और समुद्री पर्यावरण संरक्षण की दिशा में वैश्विक स्तर पर एक जागरूक समाज के रूप में उभरकर सामने आया है।

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