झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया पर आदिवासी समाज की पीड़ा और उनके संघर्ष को लेकर एक मार्मिक संदेश साझा किया है। उन्होंने सवाल किया है कि जिस समाज ने इतिहास में कभी किसी के सामने घुटने नहीं टेके, वह आज अपने ही संवैधानिक अधिकारों के लिए दर-दर क्यों भटक रहा है?
इतिहास गवाह, पर वर्तमान चुनौतीपूर्ण मुख्यमंत्री ने लिखा कि जिन आदिवासियों ने संथाल हूल और भगवान बिरसा मुंडा के उलगुलान जैसे ऐतिहासिक आंदोलनों के जरिए देश को प्रेरणा दी, आज वही समुदाय अपनी पहचान के लिए जूझ रहा है। सोरेन के अनुसार, यह लोकतंत्र का एक आईना है, जो इस कड़वी सच्चाई को दिखा रहा है कि संघर्ष करने वाले समुदाय को आज भी सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
असम के चाय बागानों का मुद्दा मुख्यमंत्री ने असम के चाय बागानों में काम कर रहे आदिवासियों की बदहाली को भी प्रमुखता से उठाया। साझा किए गए पोस्टरों के जरिए उन्होंने बताया कि ब्रिटिश काल में जो लोग बाहर से लाए गए और जिन्होंने अपनी मेहनत से असम की अर्थव्यवस्था को सींचा, उन्हें आजादी के इतने साल बाद भी अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा नहीं मिला है।
न्याय और सम्मान की मांग सोरेन ने इसे किसी पार्टी की राजनीति से ऊपर उठकर एक गंभीर मानवीय मुद्दा बताया है। उन्होंने असम के आदिवासी मतदाताओं से अपील की है कि वे अपनी पहचान, बेहतर मजदूरी, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के लिए मतदान करें। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक आदिवासियों को उनका हक नहीं मिलता, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा।
झारखंड में भी चुनौतियों का अंबार इस बीच, झारखंड में भी स्थितियां कुछ खास बेहतर नहीं हैं। राज्य में हाईस्कूल के 2034 शिक्षकों की नियुक्ति का मामला छह महीने बाद भी हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद लटका हुआ है। वहीं, दूसरी ओर शहीद बख्तर साय के वंशज भी बदहाली में जीवन जीने को मजबूर हैं, जिसे लेकर सरकार पर क्षेत्र के विकास और ऐतिहासिक धरोहरों को संवारने का दबाव बढ़ रहा है।
अंग्रेज़ों के सामने नतमस्तक नहीं होने वाले, जल–जंगल–ज़मीन की रक्षा में सदियों तक संघर्ष करने वाले, अपने स्वाभिमान को कभी न बेचने वाले, उन्हीं आदिवासियों को आज अपने ही देश में हक और पहचान के लिए दर-दर की ठोकरें क्यों खानी पड़ रही हैं?
— Hemant Soren (@HemantSorenJMM) April 8, 2026
यह केवल एक प्रश्न नहीं है, यह हमारे लोकतंत्र… pic.twitter.com/JuEtR0MQ3j
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