ईरान-अमेरिका का युद्ध विराम और चीन की नई चाल: क्या ताइवान पर मंडरा रहा है खतरे का साया?
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ईरान और अमेरिका के बीच दो हफ्ते के युद्ध विराम पर सहमति बन गई है, जिसमें पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में दोनों देशों के प्रतिनिधि बैठक करेंगे। इस युद्ध विराम ने दुनिया को कुछ हद तक राहत दी है, लेकिन एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अब नई और बड़ी आशंकाएं पैदा हो गई हैं।

चीन ने ताइवान की सीमा में बढ़ाई घुसपैठ

युद्ध विराम की चर्चा के बीच, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने अपनी आक्रामक नीतियां तेज कर दी हैं। ताइवान के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, 8 अप्रैल की सुबह 2 चीनी विमानों ने मीडियन लाइन पार की और ताइवान के एयरस्पेस में प्रवेश किया। साथ ही, 9 नौसैनिक जहाजों और एक सरकारी पोत की मौजूदगी ने ताइवान को हाई अलर्ट पर ला दिया है।

अमेरिका की ताकत की पोल खुली

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान संघर्ष ने अमेरिका की सीमित वैश्विक क्षमता को उजागर कर दिया है। पश्चिम एशिया में ड्रोन हमलों से बचने के लिए अमेरिका को दक्षिण कोरिया से THAAD इंटरसेप्टर मिसाइलें मंगानी पड़ीं, जिससे उसके हथियारों के स्टॉक की कमी खुलकर सामने आ गई। घरेलू दबाव, बढ़ती महंगाई और संसाधनों की तंगी ने अमेरिका के डिटरेंस (दबाव बनाने की क्षमता) को कमजोर कर दिया है।

ट्रंप की नीतियां बनीं अमेरिका के लिए बोझ

ट्रंप प्रशासन की विदेश और व्यापार नीतियों ने अमेरिका को दुनिया भर में अलग-थलग कर दिया है। ब्रिटेन, कनाडा और जर्मनी जैसे सहयोगियों के साथ टैरिफ विवाद ने अमेरिका को मित्रविहीन बना दिया है। जानकार इसे ट्रंप प्रशासन की कूटनीतिक विफलता मान रहे हैं। एक साथ कई मोर्चों—ईरान, वेनेजुएला और ट्रेड वॉर—में उलझकर अमेरिका ने अपनी सैन्य और रणनीतिक पकड़ को ढीला कर दिया है।

क्या अमेरिका ताइवान की रक्षा कर पाएगा?

सवाल यह है कि अगर चीन ताइवान पर हमला करता है, तो क्या संघर्षों में घिरी अमेरिकी सेना हस्तक्षेप कर पाएगी? जानकारों का कहना है कि चीन ग्रे-जोन रणनीति अपना रहा है—अर्थात सीधे युद्ध के बजाय साइबर हमले, नाकाबंदी और दबाव बनाकर ताइवान को झुकाने की कोशिश। होर्मुज जलडमरूमध्य की तरह ही, ताइवान स्ट्रेट में भी चीन वैश्विक व्यापार को ठप करने की धमकी दे सकता है।

ताइवान की चुनौती और भविष्य

ताइवान के सामने अब अस्तित्व का सवाल है। विशेषज्ञों की राय है कि अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय ताइवान को अपनी रक्षा क्षमता और जन-एकजुटता को बढ़ाना होगा। चीन अमेरिका के संसाधन ह्रास को एक अवसर के रूप में देख रहा है। फिलहाल, ताइवान पूरी तरह सतर्क है, लेकिन यह स्पष्ट है कि ट्रंप प्रशासन की बिखरी हुई नीतियों ने भविष्य में चीन के लिए एक बड़ा रणनीतिक अवसर पैदा कर दिया है।

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