JPSC मुख्य परीक्षा में गड़बड़ियों का अंबार: क्या सवालों के स्तर से खिलवाड़ कर रहा है आयोग?
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झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) द्वारा आयोजित सहायक वन संरक्षक (ACF) मुख्य परीक्षा विवादों के घेरे में आ गई है। 4 से 12 अप्रैल के बीच आयोजित इस परीक्षा के प्रश्नपत्रों में न केवल टाइपिंग की भारी भूलें मिली हैं, बल्कि अनुवाद और व्याकरण की अशुद्धियों ने अभ्यर्थियों का मानसिक संतुलन बिगाड़ दिया है।

सवाल गलत या पूरी प्रक्रिया ही दोषपूर्ण? परीक्षार्थियों का आरोप है कि प्रत्येक प्रश्नपत्र में 100 से अधिक गलतियां हैं। कहीं शब्दों की वर्तनी (Spelling) गलत है, तो कहीं वाक्य संरचना का अर्थ ही बदल गया है। अभ्यर्थियों का कहना है कि जब प्रश्न ही अस्पष्ट हैं, तो वे सही उत्तर कैसे दें। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे प्रश्नपत्रों के स्क्रीनशॉट आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

अनुवाद की लापरवाही और बदलते अर्थ परीक्षा में हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए स्थिति सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण रही। संघीय को संछीय , अर्धसंघीय को अर्धसंधीम और सहकारी संघवाद को सहकारी संधवाद लिखकर आयोग ने विषय की गंभीरता को ही खत्म कर दिया। विज्ञान के प्रश्नों में भी भाषा का ऐसा घालमेल है कि छात्र मूल अवधारणा को समझने में ही उलझ गए।

नंबरिंग से लेकर छपाई तक गड़बड़झाला केवल शब्दों की गलती ही नहीं, प्रश्नपत्र की संरचना भी बेहद खराब रही है। कई सेक्शन में नंबरिंग गलत है (जैसे एक ही नंबर दो बार या क्रम का उल्टा होना), जिससे छात्रों का बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ। इसके अलावा, धुंधले टेक्स्ट, कटे हुए शब्द और गलत लेआउट ने परीक्षार्थियों के मानसिक तनाव को दोगुना कर दिया है।

सालों की मेहनत पर पानी फेरने का आरोप सोशल मीडिया पर छात्र अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। उम्मीदवारों का कहना है कि सालों की कड़ी मेहनत के बाद जब वे परीक्षा हॉल में पहुंचते हैं, तो उन्हें ऐसा मजाक देखने को मिलता है। कई यूजर ने तंज कसा है कि यदि आयोग की निगरानी व्यवस्था फेल हो चुकी है, तो क्या वे बिना किसी प्रूफरीडिंग के पेपर बांट रहे हैं?

सिस्टम की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिह्न यह मामला केवल कुछ गलतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि जेपीएससी (JPSC) जैसी प्रतिष्ठित संस्था की साख का सवाल है। क्या आयोग में विषय विशेषज्ञों की कमी है? क्या गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त हो चुकी है? ऐसे सवालों ने राज्य के युवाओं का भरोसा तोड़ दिया है। अब देखना यह है कि क्या आयोग इस मामले में कोई संज्ञान लेता है या अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में लटका रहेगा।

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