चांद का अंधेरा और 40 मिनट का सस्पेंस: आर्टेमिस-2 ने तोड़ा 56 साल पुराना इतिहास
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नासा के आर्टेमिस-2 मिशन ने अंतरिक्ष इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया है। भारतीय समयानुसार रात 11:26 बजे, ओरियन स्पेसक्राफ्ट ने पृथ्वी से 4,00,171 किलोमीटर की दूरी तय कर अपोलो-13 के 56 साल पुराने रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया। अब चार एस्ट्रोनॉट्स मानवता के इतिहास में पृथ्वी से सबसे दूर जाने वाले इंसान बन गए हैं।

टूटा दूरी का महा-रिकॉर्ड आर्टेमिस-2 के एस्ट्रोनॉट्स ने अब 4,02,336 किलोमीटर की दूरी का आंकड़ा पार कर लिया है। यह दूरी इतनी अधिक है कि सामान्य गति से कार द्वारा वहां पहुंचने में करीब 6 महीने का समय लग जाएगा। ओरियन ने डीप स्पेस की उस अदृश्य सीमा को लांघ लिया है, जहां से वापसी अब पूरी तरह चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव पर निर्भर है।

40 मिनट का ब्लैकआउट और सस्पेंस जब ओरियन चंद्रमा के फार साइड (पिछले हिस्से) की ओर बढ़ा, तो धरती से उसका रेडियो संपर्क पूरी तरह टूट गया। इसे लूनर एक्लिप्स ऑफ कम्युनिकेशन कहा जाता है। करीब 40 मिनट तक नासा के मिशन कंट्रोल में सन्नाटा पसरा रहा। पूरी दुनिया की सांसें थमी हुई थीं, लेकिन जैसे ही ओरियन दूसरी तरफ से सही-सलामत बाहर निकला और पहला सिग्नल मिला, मिशन कंट्रोल तालियों से गूंज उठा।

चांद के पीछे छिप गया सूरज चंद्रमा के पीछे रहने के दौरान एस्ट्रोनॉट्स ने एक दुर्लभ सौर ग्रहण देखा। अंधेरे में उन्होंने चंद्रमा की सतह पर गिरते उल्कापिंडों और अंतरिक्ष की धूल को करीब से महसूस किया। इसके बाद, उन्होंने सूर्य की बाहरी परत कोरोना का अद्भुत नजारा देखा।

अर्थराइज का जादुई नजारा जैसे ही ओरियन चंद्रमा के पीछे से बाहर निकला, अंतरिक्ष यात्रियों ने अर्थराइज का विहंगम दृश्य देखा। काले अंतरिक्ष के बैकग्राउंड में हमारी पृथ्वी एक छोटी सी, चमकती हुई नीली गेंद की तरह दिखाई दे रही थी। यह नजारा 1968 के अपोलो-8 मिशन के बाद पहली बार किसी इंसान ने इतने करीब से देखा है।

अब शुरू हुई घर वापसी चांद का चक्कर लगाने के बाद, ओरियन अब फ्री-रिटर्न ट्रेजेक्टरी पर है। अब इसे इंजन चलाने की जरूरत नहीं है; चंद्रमा की ग्रेविटी ने ही इसे घर की ओर धकेल दिया है।

अगली सबसे बड़ी चुनौती वापसी का सफर सबसे खतरनाक है। ओरियन लगभग 40,000 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करेगा। इस दौरान घर्षण से पैदा होने वाला तापमान 2,700 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाएगा। अंत में, कैप्सूल प्रशांत महासागर में पैराशूट की मदद से सुरक्षित लैंडिंग (Splashdown) करेगा, जिसके बाद ही यह मिशन पूरी तरह सफल माना जाएगा।

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