भारत-चीन संबंधों में नई आहट: 5 साल बाद शंघाई पहुंचा भारतीय बिजनेस डेलिगेशन, क्या पिघलेगी बर्फ ?
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पिछले 5-6 सालों से भारत और चीन के बीच चल रहे तनाव के बाद अब एक सकारात्मक बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। 2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद आर्थिक संबंधों में जो स्थिरता आई थी, उसे तोड़ने की दिशा में पहला ठोस कदम उठाया गया है। हाल ही में भारतीय व्यापारियों का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल चीन के दौरे से लौटा है।

क्या है यह बिजनेस डिप्लोमेसी ? PHD चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PHDCCI) से जुड़े उद्योगपतियों का एक दल 29 मार्च से 4 अप्रैल 2026 तक चीन के शंघाई और जियांगसू शहरों में रहा। इस दौरे में पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के प्रमुख उद्योगपतियों ने हिस्सा लिया। चीन की प्रवक्ता यू जिंग ने इसे दोनों देशों के बीच संबंधों में जमी बर्फ के पिघलने के संकेत के रूप में देखा है। इस दौरे का मुख्य लक्ष्य भविष्य की तकनीक, जैसे कि इलेक्ट्रिक वाहन (EV), सौर ऊर्जा और आधुनिक विनिर्माण पर चर्चा करना था।

चीन को क्यों है भारत की जरूरत? चीन फिलहाल ओवरकैपेसिटी की समस्या से जूझ रहा है। वहां की कंपनियां ज़रूरत से ज्यादा सामान बना रही हैं, लेकिन घरेलू मांग कम होने के कारण उनका माल बिक नहीं रहा है। चीन की करीब 29% औद्योगिक कंपनियां घाटे में हैं। अमेरिका और यूरोप द्वारा चीनी सामान पर भारी टैक्स लगाए जाने के बाद, चीन की 140 करोड़ की आबादी वाले भारतीय बाजार पर नजरें टिकी हैं। चीन के लिए भारत एक लाइफलाइन की तरह है, जहां वह अपनी अतिरिक्त उत्पादन क्षमता को खपा सकता है।

भारत के लिए अवसर और चुनौतियां भारत अपनी प्रगति के लिए चीन पर काफी हद तक निर्भर है। हम अपनी लिथियम-आयन बैटरी की 85% जरूरतों और 70% से अधिक दवा सामग्री (API) के लिए चीन पर निर्भर हैं। ई-वी मोटरों के लिए जरूरी 93% दुर्लभ खनिज भी चीन से ही आते हैं। हालांकि, चुनौती यह है कि भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर के पार (फरवरी 2026 तक करीब 102 अरब डॉलर) पहुंच गया है। भारत चीन से भारी मात्रा में आयात करता है, जबकि निर्यात उसके मुकाबले काफी कम है।

कैसे सुधारे जा रहे हैं रिश्ते? गलवान के बाद पैदा हुई कड़वाहट को कम करने की प्रक्रिया अक्टूबर 2024 में सीमा पर गतिरोध समाप्त होने के साथ शुरू हुई थी। इसके बाद ब्रिक्स और एससीओ समिट्स में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकातें, चीनी विदेश मंत्री वांग यी का दिल्ली दौरा, और हाल ही में वीजा प्रतिबंधों में ढील और उड़ानों की बहाली जैसे कदमों ने माहौल को बदला है।

निष्कर्ष: क्या भारत बनेगा डंपिंग ग्राउंड? चीन के साथ व्यापारिक बातचीत का खुलना अच्छी खबर है, लेकिन भारत सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह चीन को भारत का ईवी डंपिंग ग्राउंड न बनने दे। भारत चाहता है कि वह नई तकनीक का लाभ ले, लेकिन आत्मनिर्भरता की अपनी नीति से समझौता किए बिना। यह दौरा फिलहाल एक नेटवर्किंग का हिस्सा है, लेकिन यह साफ है कि भविष्य में दोनों देशों के बीच व्यापार का एक नया और संभला हुआ स्वरूप देखने को मिल सकता है।

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