भवानीपुर का घमासान: ममता बनाम सुवेंदु, क्या ढह रहा है टीएमसी का किला?
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कोलकाता पहुंचने के 24 घंटे के भीतर ही राजनीतिक सरगर्मी का अंदाज़ा साफ हो गया है। भवानीपुर की गलियां इस समय किसी रणभूमि से कम नहीं हैं, जहां झंडे और बैनर स्पष्ट रूप से इलाके बांट रहे हैं। बीजेपी और टीएमसी के बीच का यह मुकाबला इतना कड़ा है कि किसी की भी जीत पर अभी से मुहर लगाना जल्दबाजी होगी।

चाय की दुकानों पर क्या है आम जनता का मूड? रविवार की सुबह भवानीपुर के व्यस्त चाय स्टॉल्स पर जब मैंने वहां के स्थानीय व्यापारी वर्ग (मारवाड़ी और गुजराती समुदाय) से बात की, तो एक अलग ही तस्वीर सामने आई। फाफरा और जलेबी के नाश्ते के बीच चर्चा का मुख्य केंद्र रोजगार था। लोगों का कहना है कि जीवन तो चल रहा है, लेकिन बंगाल में औद्योगिक विकास की रफ्तार धीमी है।

डबल इंजन की थ्योरी का असर स्थानीय लोगों में इस बात की कसक है कि युवाओं को काम के लिए बेंगलुरु या हैदराबाद जाना पड़ रहा है। उनके मन में यह सवाल गहरे तक पैठ चुका है कि क्या विपक्ष की सरकार होने के कारण बंगाल को केंद्र की मदद नहीं मिल रही? यहीं पर बीजेपी की डबल इंजन सरकार वाली थ्योरी जनता के बीच असर दिखाती नजर आती है।

टीएमसी में नर्वसनेस और खामोश वोटर इस चुनाव में एक दिलचस्प बदलाव टीएमसी के खेमे में दिख रहा है। पार्टी के पुराने समर्थक खुलकर बात करने से बच रहे हैं, जबकि बीजेपी कार्यकर्ता बदलाव की बातें जोर-शोर से कर रहे हैं। टीएमसी नेताओं का भी यह मानना है कि 15 साल की सत्ता के बाद एंटी-इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) एक बड़ी चुनौती है।

SIR का डर और अंदरूनी असंतोष टीएमसी के भीतर सबसे बड़ी चिंता SIR को लेकर है—यानी पार्टी की रणनीति बनाने वाली वह संस्था, जिसने कई नेताओं के टिकट काटे हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि जिन सीटों पर हार-जीत का अंतर कम था, वहां इस फैसले से नुकसान हो सकता है। पार्टी में घबराहट साफ दिख रही है, क्योंकि उन्हें एहसास है कि बीजेपी अपनी पूरी ताकत झोंकने को तैयार है।

क्या है निष्कर्ष? भले ही तृणमूल कांग्रेस अभी भी सरकार बनाने का दावा कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह बताती है कि यह लड़ाई करो या मरो की बन चुकी है। बंगाल की राजनीति में एक छोटा सा मुद्दा कभी भी पूरी बाजी पलट सकता है। टीएमसी और बीजेपी—दोनों ही फिलहाल उस एक ट्रिगर पॉइंट की तलाश में हैं, जो सत्ता की चाबी उन्हीं के हाथ में सौंप दे। अभी तो ये महज शुरुआत है, आगे देखना होगा कि पारा कितना और चढ़ता है।

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