संसद का बजट सत्र तीन दिनों के लिए बढ़ा दिया गया है, जिसका मुख्य एजेंडा 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को 2029 से लागू करना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी दलों से इस पर समर्थन मांगा है, लेकिन समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार को घेर लिया है।
आधार ही निराधार है
अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण बिल के खाके पर सवाल उठाते हुए इसे गणित का गलत खेल बताया है। उनका तर्क है कि यदि आरक्षण का आधार कुल सीटों का एक-तिहाई है, तो इसके लिए सटीक संख्या यानी जनसंख्या की आवश्यकता होगी।
पूर्व मुख्यमंत्री का कहना है कि सरकार 2011 के पुराने जनगणना आंकड़ों के आधार पर यह कानून लागू करना चाहती है। उनके अनुसार, जब आधारभूत आंकड़े ही पुराने और अविश्वसनीय हैं, तो आरक्षण का लाभ सही लाभार्थियों तक कैसे पहुंचेगा?
पहले जनगणना, फिर आरक्षण
सपा प्रमुख ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण की विरोधी नहीं है, बल्कि इसके क्रियान्वयन के तरीके के खिलाफ है। अखिलेश यादव ने कहा, जब तक जनगणना नहीं हो जाती, तब तक महिला आरक्षण पर बहस करना बेमानी है।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि यदि सरकार की मंशा साफ होती, तो वह पहले गिनती पूरी करवाती। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार महिलाओं को गिनना ही नहीं चाहती, तो उन्हें आरक्षण देने का दावा महज एक छलावा है।
राजनीतिक दांव-पेंच और 2027 की तैयारी
अखिलेश यादव का यह विरोध केवल नीतिगत नहीं, बल्कि सियासी भी है। जानकारों का मानना है कि वे पिछड़ा और अल्पसंख्यक कार्ड के जरिए सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
दूसरी ओर, अखिलेश यादव ने दादरी में मिहिर भोज डिग्री कॉलेज को अपनी रैली के लिए चुनकर उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए शंखनाद कर दिया है। स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में महिला आरक्षण का यह मुद्दा संसद से सड़क तक और गरमाने वाला है।
जब गिनती ही गलत होगी तो आरक्षण कैसे सही होगा।
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) April 5, 2026
अगर किसी काम को करने की सही मंशा होती है, तो शंका नहीं होती है।
दरअसल महिला आरक्षण बिल का तो आधार ही निराधार है। आरक्षण का आधार अगर कुल सीटों का 1/3 (एक तिहाई) है तो इसका मतलब हुआ कि ये गणित का विषय है और गणित का आधार अंक होते हैं,… pic.twitter.com/3I8c7lfOnQ
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