पश्चिम बंगाल की राजनीति में अब ध्रुवीकरण का नया अध्याय शुरू होता दिख रहा है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर के साथ मिलकर एक नया इस्लामिक गठबंधन तैयार किया है। मुर्शिदाबाद को अपनी प्रयोगशाला बनाकर ओवैसी बंगाल की 125 मुस्लिम-बहुल सीटों को साधने की कोशिश में हैं।
ओवैसी का स्वतंत्र नेतृत्व का दांव मुर्शिदाबाद की रैली में ओवैसी ने दो टूक शब्दों में कहा कि बंगाल के मुसलमानों को अब अपना स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व खड़ा करने की जरूरत है। ओवैसी के साथ मौजूद हुमायूं कबीर अपनी कट्टर छवि के लिए जाने जाते हैं। जानकारों का मानना है कि ओवैसी ने इस बार बाहरी होने का ठप्पा मिटाने के लिए हुमायूं जैसे स्थानीय और विवादित चेहरों का सहारा लिया है।
ममता के लिए कितनी बड़ी चुनौती? बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 से 33 प्रतिशत है, जो राज्य की 112 से 125 सीटों पर सीधा प्रभाव रखती है। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि मुस्लिम मतदाताओं का अब भी ममता बनर्जी पर गहरा भरोसा है। 2024 के आंकड़ों के अनुसार, करीब 84 प्रतिशत मुस्लिम वोट टीएमसी के खाते में गए। ममता बनर्जी ने इमाम-मुअज्जिमों का भत्ता बढ़ाकर और मदरसों के आधुनिकीकरण पर जोर देकर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी है।
इतिहास गवाह है: ओवैसी के लिए राह आसान नहीं 2021 के विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने 7 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन सभी की जमानत जब्त हो गई। उनका कुल वोट शेयर महज 0.02 प्रतिशत रहा। वहीं, उनके नए साथी हुमायूं कबीर का रिकॉर्ड भी मिला-जुला रहा है; वे तभी चुनाव जीत पाए जब बड़ी पार्टियों का साथ था। निर्दलीय या कमजोर आधार पर वे अपनी सीट नहीं बचा सके।
वोट कटवा या राजनीतिक शक्ति? बंगाल के मुस्लिम मतदाताओं के बीच एक बड़ा डर यह है कि ओवैसी को वोट देने से वोट बैंक का बंटवारा होगा, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। कई प्रभावशाली धार्मिक नेताओं ने भी मतदाताओं को इस गठबंधन से दूर रहने की सलाह दी है।
क्या यह नया गठबंधन ममता बनर्जी के अभेद्य किले में सेंध लगाने में सफल होगा, या फिर ओवैसी का बंगाल में भी पिछला इतिहास ही दोहराया जाएगा? इसका जवाब तो आने वाले चुनाव ही देंगे, लेकिन फिलहाल राजनीति की बिसात पर मजहबी फॉर्मूला एक बार फिर चर्चा का केंद्र बन गया है।
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— Zee News (@ZeeNews) April 1, 2026
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