शांतिदूत बनने का सपना टूटा, 72 घंटे में चीन ने पाकिस्तान को दिखाई उसकी औकात!
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पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार का हालिया बीजिंग दौरा कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। ईरान और अमेरिका के बीच सुलह कराकर खुद को ग्लोबल पीसमेकर के रूप में स्थापित करने का उनका मंसूबा महज 72 घंटों में धूल में मिल गया। चीन ने न केवल उनकी कोशिशों को खारिज किया, बल्कि पाकिस्तान को उसकी कड़वी हकीकत का आईना भी दिखा दिया।

मध्यस्थता की बेतुकी जिद पाकिस्तान का तर्क था कि ईरान और अमेरिका दोनों से उसके बेहतर संबंध हैं, इसलिए वह सुलह करवा सकता है। लेकिन जानकारों के लिए यह दावा किसी मजाक से कम नहीं था। आर्थिक कंगाली और आतंकवाद से जूझ रहा देश, जो खुद सीमा सुरक्षा के लिए दूसरों का मोहताज है, वह वैश्विक ताकतों की गारंटी कैसे दे सकता है? बीजिंग ने पाकिस्तान की इस गैर-व्यावहारिक इच्छा को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

अफगानिस्तान के सामने झुकाया सिर पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा अपमान तब हुआ जब चीन ने उसे उरुमकी में अफगानिस्तान के साथ बातचीत की मेज पर बैठने का आदेश दिया। पाकिस्तान जो तालिबान को सबक सिखाने की हुंकार भर रहा था, उसे चीन के दबाव में घुटने टेकने पड़े। चीन का एकमात्र उद्देश्य अपने हितों (ETIM आतंकियों से सुरक्षा) की रक्षा करना था, जिसके लिए उसने पाकिस्तान को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया।

उरुमकी बैठक: पाकिस्तान की बड़ी हार उरुमकी में आयोजित त्रिपक्षीय बैठक में पाकिस्तान ने टीटीपी (TTP) का मुद्दा उठाया, लेकिन अफगान तालिबान ने उसे सिरे से खारिज कर दिया। पाकिस्तान बिना किसी ठोस उपलब्धि के व्यापारिक रास्ते खोलने और सैन्य कार्रवाई में ढील देने पर राजी हो गया। कूटनीतिक रूप से यह पाकिस्तान की करारी हार है, क्योंकि उसे अपनी शर्तों के बजाय चीन के इशारे पर झुकना पड़ा।

चीन का स्वार्थी गेम प्लान चीन की कूटनीति पूरी तरह से उसके अपने आर्थिक और सुरक्षा हितों पर आधारित है। वह ईरान-अमेरिका जैसे जोखिम भरे विवाद में पाकिस्तान जैसे अस्थिर देश को बीच में लाकर खुद को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता। चीन के लिए पाकिस्तान सिर्फ एक जरिया है, न कि कोई रणनीतिक साझेदार। बीजिंग ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि पाकिस्तान को शांति का ढोंग करने के बजाय, उसकी शर्तों के अनुसार अफगानिस्तान के साथ काम करना होगा।

क्या खत्म हो चुकी है पाकिस्तान की साख? 72 घंटों के इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता ना के बराबर है। वह न तो अमेरिका का विश्वास जीत पा रहा है और न ही चीन उसे स्वतंत्र निर्णय लेने दे रहा है। पाकिस्तान की स्थिति उस शांतिदूत जैसी हो गई है जिसे खुद के घर में भी कोई गंभीरता से नहीं ले रहा। यह घटनाक्रम साबित करता है कि पाकिस्तान की कूटनीति अब मात्र दूसरे देशों के हितों की पूर्ति करने वाली एक लाचार नीति बनकर रह गई है।

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