बंगाल चुनाव 2026: ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन, ममता बनर्जी की बढ़ी मुश्किलें
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मुर्शिदाबाद में एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर (आम जनता उन्नयन पार्टी) की संयुक्त रैली ने पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। इस गठबंधन ने 2026 के विधानसभा चुनाव को त्रिकोणीय मुकाबले में तब्दील कर दिया है।

वोटिंग मशीन बनने से इनकार

जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने तीखे तेवर अपनाए। उन्होंने कहा कि दशकों से बंगाल के मुसलमानों का इस्तेमाल सिर्फ वोटिंग मशीन की तरह किया गया है। ओवैसी ने सवाल किया कि 30 फीसदी आबादी होने के बावजूद सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी महज 7 फीसदी क्यों है? उन्होंने तर्क दिया कि जब तक समाज का अपना मजबूत नेतृत्व नहीं होगा, तब तक वास्तविक विकास संभव नहीं है।

ममता बनर्जी पर सीधा हमला

ओवैसी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि ईद पर दुआ मांगने से बच्चों का पेट नहीं भरता और न ही शिक्षा मिलती है। उन्होंने ओबीसी सर्टिफिकेट रद्द होने के मुद्दे पर ममता सरकार को घेरा और इसे अल्पसंख्यकों के साथ सरासर अन्याय करार दिया।

कांग्रेस और लेफ्ट भी निशाने पर

ओवैसी ने कांग्रेस और लेफ्ट पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि ये पार्टियां खुद को धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटती हैं, लेकिन जब मुसलमानों के हक की बात आती है, तो वे चुप्पी साध लेती हैं। ओवैसी ने आरोप लगाया कि ये पार्टियां भाजपा का डर दिखाकर मुसलमानों को अपना गुलाम बनाए रखना चाहती हैं।

मुर्शिदाबाद और मालदा में नया समीकरण

ओवैसी और हुमायूं कबीर की जोड़ी ने ममता बनर्जी के पारंपरिक गढ़ माने जाने वाले मुर्शिदाबाद और मालदा में बड़ी चुनौती पेश की है। हुमायूं कबीर ने ममता सरकार पर मुसलमानों के साथ विश्वासघात का आरोप लगाया। दोनों नेताओं ने 180 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है।

क्या सत्ता की चाबी बदलेंगे ओवैसी?

ओवैसी ने समर्थकों से अपील की कि वे इस बार केवल मतदाता न बनें, बल्कि किंगमेकर की भूमिका निभाएं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह गठबंधन मुस्लिम वोटों में सेंध लगाता है, तो टीएमसी के लिए सत्ता बरकरार रखना एक बड़ी चुनौती साबित होगा। अब सबकी निगाहें 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान पर टिकी हैं।

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