60 साल बनाम 12 साल : नक्सलवाद के खात्मे पर कंगना रनौत का कांग्रेस पर बड़ा प्रहार
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संसद में नक्सलवाद और वामपंथी उग्रवाद के मुद्दे पर चर्चा के दौरान भाजपा सांसद कंगना रनौत ने केंद्र सरकार की नीतियों की जमकर सराहना की। उन्होंने दावा किया कि जो समस्या पिछले 60 सालों में हल नहीं हो सकी, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में महज 12 वर्षों में जड़ से उखाड़ फेंका गया है।

कांग्रेस की लापरवाही पर कटाक्ष कंगना ने इतिहास को याद करते हुए कहा कि 1967 में नक्सलवाद एक छोटी सी चिंगारी के रूप में उभरा था। यदि तत्कालीन कांग्रेस सरकारें चाहतीं, तो इसे समय रहते रोका जा सकता था। आरोप लगाया गया कि सरकार ने आदिवासी समाज के साथ भेदभाव किया और वैचारिक मतभेदों को सुलझाने के बजाय उन्हें और गहरा होने दिया, जिसका सीधा फायदा वामपंथी उग्रवादियों को मिला।

बच्चों के हाथों में किताबें नहीं, बंदूकें थमाईं सांसद ने उग्रवादियों की बर्बरता का जिक्र करते हुए कहा कि इनकी हिंसा में 2000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी शहीद हुए। सबसे दुखद पहलू यह रहा कि जिन बच्चों के हाथों में किताबें और लैपटॉप होने चाहिए थे, उन्हें बंदूकें थमाकर हिंसा की राह पर धकेल दिया गया। उन्होंने कहा कि इन उग्रवादियों ने देश के एक बड़े हिस्से को रेड कॉरिडोर और नो-गो जोन में बदलकर रख दिया था।

2014 के बाद आया बदलाव कंगना रनौत ने कहा कि 2014 के बाद से देश में विकास और विश्वास की नीति अपनाई गई। मोदी सरकार ने आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई ठोस कदम उठाए और सुरक्षा बलों को मजबूत किया। इसका परिणाम यह रहा कि 8 हजार से ज्यादा युवाओं ने हथियार डालकर शांति का मार्ग चुना। कंगना ने जोर देकर कहा कि देश बंदूक की ताकत से नहीं, बल्कि संविधान और जन-विश्वास से चलता है।

अमित शाह की दो-टूक चेतावनी सदन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जो लोग हिंसा का समर्थन करते हैं और उसे अन्याय का नाम देते हैं, वे समझ लें कि यह नरेंद्र मोदी की सरकार है। शाह ने कहा कि हथियार उठाने वालों के लिए संविधान और अदालतों का रास्ता है, लेकिन जो संविधान को नहीं मानेगा, उसे अंजाम भुगतना होगा। उन्होंने बस्तर का उदाहरण देते हुए कहा कि लाल आतंक की परछाई के कारण ही वहां विकास नहीं पहुंच सका था।

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