ईरान-अमेरिका युद्ध में सुलगता भारत: ₹21 लाख करोड़ का चूना, आम आदमी की जेब होगी खाली
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मध्य पूर्व में छिड़ा ईरान और अमेरिका के बीच का तनाव अब केवल एक भू-राजनीतिक संघर्ष नहीं रह गया है। यह संकट सीधे भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। अर्थशास्त्री विजय सरदाना के मुताबिक, इस युद्ध के कारण भारत को सालाना करीब ₹21 लाख करोड़ का भारी-भरकम आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

महंगा तेल, भारी बोझ

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है। जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ रही हैं, सरकार का खजाना खाली होता जा रहा है। सरदाना का अनुमान है कि सिर्फ महंगे कच्चे तेल के कारण देश पर ₹2 लाख करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है, जो विकास कार्यों की गति को प्रभावित कर सकता है।

रुपये की गिरावट और व्यापार घाटा

तेल की मार के अलावा, डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने भी घाव को गहरा कर दिया है। रुपये के गिरते स्तर से आयात और महंगा हो गया है, जिससे लगभग ₹1 लाख करोड़ का अतिरिक्त नुकसान हो रहा है। इसके साथ ही, निर्यात पर दबाव और आयात बिल में बढ़ोतरी ने देश के ट्रेड बैलेंस (व्यापार संतुलन) को बिगाड़ दिया है।

क्या अमेरिका है जिम्मेदार?

इस संकट को लेकर बहस छिड़ गई है कि क्या भारत को अपने नुकसान की भरपाई अमेरिका से मांगनी चाहिए। विजय सरदाना का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसी मांग व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विकसित देशों, खासकर अमेरिका की नीतियों का खामियाजा भारत जैसे विकासशील देशों को भुगतना पड़ता है। फैसले कहीं और लिए जाते हैं, लेकिन उसकी आर्थिक कीमत भारत जैसे ऊर्जा-आयात करने वाले देशों को चुकानी पड़ती है।

होर्मुज का संकट और भारत पर असर

रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल आपूर्ति करता है। भारत इस रूट पर अत्यधिक निर्भर है। इस क्षेत्र में जारी अस्थिरता सीधे तौर पर भारतीय बाजारों को हिला रही है। यदि यहां तनाव और बढ़ता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम और अधिक बढ़ जाएगा।

आम जनता पर मरेगी महंगाई की मार

इस संकट का असर केवल सरकारी आंकड़ों तक सीमित नहीं रहने वाला है। आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम बढ़ सकते हैं। उद्योगों के लिए परिचालन लागत बढ़ने से जरूरी वस्तुओं के दाम में वृद्धि होगी, जिसका सीधा असर आम आदमी की रसोई और जेब पर पड़ेगा। इससे देश की आर्थिक विकास दर भी सुस्त पड़ सकती है।

आत्मनिर्भरता ही एकमात्र रास्ता

यह पूरा घटनाक्रम भारत के लिए एक कड़ा संदेश है। ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता अब केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि अस्तित्व की जरूरत है। भारत को एथेनॉल ब्लेंडिंग, सौर ऊर्जा और घरेलू तेल उत्पादन को तेजी से बढ़ावा देना होगा। फिलहाल, ईरान युद्ध का यह अप्रत्यक्ष हमला भारत के आर्थिक भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

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