1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ, तो केवल जमीन और संपत्ति का ही नहीं, बल्कि सैन्य बलों का भी विभाजन हुआ। उस दौर में कई अधिकारी धर्म के आधार पर पाकिस्तान चुन रहे थे। लेकिन कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने अपनी वर्दी और देश के प्रति कर्तव्य को धर्म से ऊपर रखा। ऐसी ही एक मिसाल थे मेजर जनरल सैयद महदी हसनैन।
लाहौर रेलवे स्टेशन पर वह अहम सवाल अगस्त 1947 में, कैप्टन महदी हसनैन गढ़वाल राइफल्स की पहली बटालियन के साथ पेशावर से सहारनपुर जा रहे थे। ट्रेन दंगों के बीच से गुजर रही थी और उस पर हिंदू और सिख शरणार्थियों की सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी थी। लाहौर में रुकने पर उनके कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल मैकलीन ने उनसे एक सीधा सवाल पूछा— तुम एक मुस्लिम हो, क्या तुमने पाकिस्तान जाने का फैसला किया है? अगर हाँ, तो बेहतर होगा कि तुम अपने साथियों को यहीं छोड़ दो।
बटालियन को बीच रास्ते नहीं छोड़ सकता कैप्टन हसनैन का जवाब बेहद साहसी और प्रेरणादायक था। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा, मेरी पहली जिम्मेदारी मेरी यूनिट के प्रति है। मैं अपनी बटालियन को सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाने के मिशन पर हूं और उन्हें बीच रास्ते में छोड़कर कहीं नहीं जा सकता। उनके इस जवाब ने कमांडिंग ऑफिसर को अवाक कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि भारत ही उनकी मातृभूमि है और उनकी वफादारी अटूट है।
अदम्य साहस और शानदार करियर कैप्टन हसनैन ने अपनी जान जोखिम में डालकर सैकड़ों शरणार्थियों को सुरक्षित सहारनपुर पहुंचाया। उनकी यह निष्ठा आगे चलकर उनके शानदार करियर की बुनियाद बनी। मेजर जनरल सैयद महदी हसनैन भारतीय सेना में पहले ऐसे मुस्लिम अधिकारी बने, जिन्हें एक डिवीजन (20 माउंटेन डिवीजन) को कमांड करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर बर्मा तक का सफर 1941 में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल हुए हसनैन ने द्वितीय विश्वयुद्ध में भी अपनी वीरता का परिचय दिया था। उन्होंने बर्मा (म्यांमार) को जापानी चंगुल से मुक्त कराने और इंडोनेशिया के सुमात्रा में जापानी सेना को पीछे धकेलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
इतिहास में अपनी एलएलबी और एमए की डिग्री पूरी करने वाले मेजर जनरल हसनैन 27 जनवरी, 1972 को डायरेक्टर जनरल के पद से रिटायर हुए। उनकी कहानी आज भी भारतीय सेना की धर्मनिरपेक्षता और देश के प्रति अटूट समर्पण का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है।
*A Visionary & Outstanding Military Leader Major General Syed Mahdi Hasnain, PVSM was the raising commanding officer of the 4th Battalion the #GarhwalRifles of the #IndianArmy. He was commissioned in the British Indian Army in the 1st Royal Garhwal Rifles in 1943. @atahasnain53 pic.twitter.com/btEFxYzKSj
— Soldiering 🇮🇳 (@Soldiering_) February 10, 2020
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