इजराइल-ईरान युद्ध में कूदा भारत का पड़ोसी! सऊदी अरब के साथ समझौते ने बढ़ाई पाकिस्तान की मुश्किलें
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इजराइल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध को 20 दिन पूरे हो चुके हैं। इस संघर्ष में दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, जिसका सीधा असर अब वैश्विक तेल सप्लाई पर पड़ रहा है। अमेरिका ने ईरान को चेतावनी दी है कि यदि उसके हमले नहीं रुके, तो वह ईरान के खार्ग द्वीप को पूरी तरह तबाह कर देगा। यह द्वीप ईरान के 90% तेल निर्यात का मुख्य केंद्र है।

सऊदी अरब का सख्त रुख ईरान द्वारा खाड़ी देशों के तेल भंडारों को निशाना बनाए जाने के बाद सऊदी अरब का धैर्य जवाब दे गया है। सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने स्पष्ट कर दिया है कि ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों के जवाब में सऊदी सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने इस मुद्दे पर पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्रियों के साथ आपात बैठक भी की है।

पाकिस्तान के लिए मुसीबत का सबब सऊदी अरब की कड़ी चेतावनी का असर सीधे पाकिस्तान पर पड़ रहा है। पिछले साल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच नाटो-स्टाइल का एक रक्षा समझौता हुआ था, जिसके तहत एक देश पर हमले को दोनों पर हमला माना जाएगा। यदि सऊदी अरब युद्ध में कूदता है, तो इस समझौते के चलते पाकिस्तान के लिए भी युद्ध में शामिल होना अनिवार्य हो जाएगा।

दो मोर्चों पर फंसा पाकिस्तान रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान पहले से ही अफगानिस्तान के साथ सीमा पर जारी संघर्ष और देश के भीतर बेतहाशा महंगाई से जूझ रहा है। ऐसे में ईरान के खिलाफ युद्ध में उतरना उसके लिए घातक साबित हो सकता है। यदि पाकिस्तान सऊदी का साथ देने निकलता है, तो ईरान अफगानिस्तान के साथ मिलकर पाकिस्तानी सीमा पर दूसरा मोर्चा खोल सकता है, जिससे पाकिस्तान चतुर्दिक घिर जाएगा।

कूटनीतिक पहेली पाकिस्तान के लिए स्थिति बेहद अजीब है। एक तरफ उसे सऊदी अरब के साथ अपने रक्षा समझौते का पालन करना है, तो दूसरी तरफ इजरायल और ईरान के बीच चल रहे इस युद्ध में उसे फूंक-फूंककर कदम रखने होंगे। इजरायल को पाकिस्तान एक दुश्मन देश मानता है और उसे आज तक मान्यता नहीं दी है। ऐसे में सऊदी की लड़ाई में शामिल होना पाकिस्तान की पहले से बदहाल आर्थिक और सैन्य स्थिति को और अधिक संकट में डाल सकता है।

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