54 साल पुराना गुप्त समझौता : क्या बांग्लादेशी घुसपैठ के पीछे इंदिरा-मुजीब की कोई सीक्रेट डील थी?
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असम और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा फिर से सुर्खियों में है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने एक बड़ा दावा करते हुए 1972 के एक कथित गुप्त समझौते को देश की वर्तमान समस्याओं का मूल कारण बताया है।

1972 का वह काला अध्याय निशिकांत दुबे का आरोप है कि 19 मार्च 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बांग्लादेश के नेता शेख मुजीबुर्रहमान के बीच एक गुप्त समझौता हुआ था। दुबे के अनुसार, इसी समझौते के तहत बांग्लादेशी नागरिकों को भारत में आने और बसने की खुली छूट दी गई। उन्होंने इसे कांग्रेस का काला अध्याय करार दिया है।

सीमावर्ती इलाकों में व्यापार का बहाना? सोशल मीडिया एक्स पर दस्तावेज साझा करते हुए दुबे ने कहा कि इस समझौते के माध्यम से पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, असम, मेघालय और मिजोरम में सीमा से 16 किलोमीटर तक आने-जाने और व्यापार करने की छूट दे दी गई थी। उनका तर्क है कि कांग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति के लिए इस रास्ते का इस्तेमाल किया।

जनसांख्यिकीय बदलाव पर गंभीर टिप्पणी दुबे ने दावा किया है कि देश में 5 से 10 करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठिए हो सकते हैं। उन्होंने झारखंड के संथाल परगना का उदाहरण देते हुए कहा कि 1951 में वहां आदिवासी आबादी लगभग 45% थी, जो अब गिरकर 24% रह गई है, जबकि मुस्लिम आबादी 9% से बढ़कर 25-26% तक पहुंच गई है।

समस्याओं की जड़ नेहरू-गांधी परिवार भाजपा सांसद का स्पष्ट आरोप है कि आज भारत जिन भी समस्याओं का सामना कर रहा है, उसकी जड़ में नेहरू-गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी है। उन्होंने इन दावों के समर्थन में कांग्रेस का काला अध्याय नामक एक श्रृंखला भी शुरू की है।

चुनावी माहौल में गरमाई राजनीति राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के ठीक पहले इस पुराने मुद्दे को उठाने के पीछे भाजपा की स्पष्ट रणनीति है। असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में घुसपैठ का मुद्दा हमेशा से भावनाओं और वोट बैंक को प्रभावित करता रहा है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक किसी अन्य स्वतंत्र स्रोत से नहीं हो पाई है, लेकिन इस बयान ने चुनावी फिज़ा में हलचल जरूर पैदा कर दी है।

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