लखनऊ: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक कांशीराम की 92वीं जयंती पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक दिलचस्प नजारा देखने को मिला। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी तक, सभी ने उन्हें नमन किया। सवाल यह है कि बसपा के अपने सबसे कमजोर दौर में होने के बावजूद आखिर सभी पार्टियां कांशीराम की विरासत पर दावा क्यों ठोक रही हैं?
राहुल गांधी का दांव और कांग्रेस की कोशिश राहुल गांधी ने हाल ही में बड़ा बयान दिया कि अगर नेहरू जिंदा होते, तो कांशीराम कांग्रेस से मुख्यमंत्री होते। इस बयान के पीछे कांग्रेस की गहरी रणनीति है। उत्तर भारत में अपनी खोई हुई जमीन पाने के लिए कांग्रेस को दलित वोटों की सख्त जरूरत है। राहुल का जाति जनगणना और हिस्सेदारी का नारा असल में उसी दलित आधार को वापस लाने की कवायद है, जो कभी कांग्रेस का हाथ थामे हुए था।
अखिलेश का PDA और भाजपा की नजर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने दलितों को साधने के लिए PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का फॉर्मूला निकाला, जो काफी हद तक कांशीराम के बहुजन मॉडल का नया संस्करण है। वहीं, भाजपा भी पीछे नहीं है। हिंदुत्व की राजनीति के बावजूद भाजपा ने रणनीतिक रूप से कांशीराम को अपनाकर दलितों के बीच अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश की है। वे भली-भांति जानते हैं कि यूपी की राजनीति में दलित वोटों की अनदेखी करना सत्ता से बाहर होने का रास्ता है।
कांशीराम: प्रयोगशाला और 21 फीसदी का वोट बैंक कांशीराम ने उत्तर प्रदेश को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बनाया था। महज 8 साल के भीतर बसपा को सत्ता तक पहुँचाने का उनका रिकॉर्ड आज भी बड़े दलों के लिए सबक है। यूपी में करीब 21 फीसदी दलित आबादी है और 84 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। इन सीटों पर जीत-हार सरकार का भविष्य तय करती है।
आरक्षित सीटों का गणित ही असली जंग आंकड़े बताते हैं कि दलित वोटों का बिखराव हो चुका है। जहां एक बड़ा वर्ग अभी भी बसपा की ओर देखता है, वहीं गैर-जाटव दलितों का झुकाव अब इंडिया गठबंधन और भाजपा की ओर भी बढ़ा है। कांशीराम का नारा— जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी —आज फिर हर दल की जुबान पर है।
निष्कर्ष सभी राजनीतिक दलों के लिए कांशीराम आज एक ऐसे इमोशनल कैपिटल बन गए हैं, जिसे भुनाकर वे दलितों के भरोसे को जीतना चाहते हैं। बसपा भले ही हाशिए पर दिख रही हो, लेकिन कांशीराम का राजनीतिक दर्शन आज भी उत्तर प्रदेश के हर चुनावी समीकरण की धुरी बना हुआ है। अब देखना यह है कि यह श्रद्धांजलि वोटों में कितनी तब्दील हो पाती है।
*अगर कांशीराम जी पं. नेहरू के दौर में होते, वो कांग्रेस पार्टी से मुख्यमंत्री होते।
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) March 13, 2026
वक़्त आ गया है हिंदुस्तान में राजनीति को बदलने का।
सबकी हिस्सेदारी की राजनीति
बहुजनों के अधिकार की राजनीति
भारत के संविधान की दिखाई राजनीति pic.twitter.com/5Mcf8PFPLN
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