चंद्रशेखर आजाद और गिरिराज सिंह की मुलाकात से सियासी हलचल!
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आजाद समाज पार्टी के मुखिया और सांसद चंद्रशेखर आजाद का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में वे भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह से गले मिलते दिख रहे हैं। इस मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।

राजनीति में मुलाकातों का दौर चलता रहता है। लेकिन जब विपक्षी नेता सत्ताधारी दल के किसी मंत्री से गर्मजोशी से मिलते हैं, तो अटकलें लगना स्वाभाविक है। यह वीडियो सामने आने के बाद कई तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कुछ लोग इसे सामान्य शिष्टाचार बता रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं।

वीडियो के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर कई तरह की टिप्पणियां शुरू हो गई हैं। कुछ यूजर्स ने चंद्रशेखर आजाद पर तंज कसते हुए कहा कि वे चिराग पासवान के बाद अब वीर हनुमान बनेंगे। यह टिप्पणी 2019 और 2024 के चुनावों के दौरान चिराग पासवान के भाजपा से अलग होकर, फिर करीब आने के संदर्भ में की गई है। हालांकि, चंद्रशेखर आजाद ने अभी तक इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है।

चंद्रशेखर आजाद को उनके भीम आर्मी आंदोलन और दलित राजनीति में एक मजबूत आवाज के रूप में जाना जाता है। वे अक्सर भाजपा की नीतियों के खिलाफ बोलते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों से उनके सुर कुछ नरम नजर आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर चंद्रशेखर आजाद भाजपा के करीब आते हैं, तो इसका असर उत्तर प्रदेश और बिहार की दलित राजनीति पर पड़ेगा। यह भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि वे दलित वोटबैंक को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करते रहे हैं।

विपक्षी दलों ने इस वायरल वीडियो पर चंद्रशेखर आजाद से स्पष्टीकरण की मांग की है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं ने इसे दलित राजनीति की दिशा बदलने की कोशिश बताया है। बसपा समर्थकों ने भी इस पर नाराजगी जताई है।

समर्थकों का कहना है कि यह सिर्फ एक सामान्य मुलाकात है और इसे ज्यादा तूल देने की जरूरत नहीं है। उनका मानना है कि चंद्रशेखर आजाद को अपनी राजनीति करने का पूरा हक है। वहीं, विरोधियों का कहना है कि क्या चंद्रशेखर भी भाजपा की गोद में बैठने जा रहे हैं? उनका आरोप है कि दलित आंदोलन के नाम पर राजनीति करने वालों का असली चेहरा सामने आ रहा है।

चंद्रशेखर आजाद और गिरिराज सिंह की मुलाकात का विवाद अभी सुर्खियों में रहेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि चंद्रशेखर आजाद खुद इस मुद्दे पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या यह मुलाकात महज एक संयोग थी या इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक रणनीति छिपी है।

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