1984 के जख्म: पीड़ितों के आंसू पोंछते हुए हरदीप पुरी और सीएम रेखा गुप्ता बोले- यह दंगे नहीं, नरसंहार था
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नई दिल्ली: 1984 के सिख विरोधी दंगों के 42 साल बाद भी उन परिवारों के सीने में दबी टीस कम नहीं हुई है। दिवाली की पूर्व संध्या पर केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के आवास पर एक भावुक संवाद का आयोजन हुआ, जहां हिंसा के शिकार हुए परिवारों ने अपनी आपबीती सुनाई। इस दौरान दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी मौजूद रहीं, जिन्होंने पीड़ित परिवारों के साथ दुख साझा किया।

यह दंगे नहीं, सुनियोजित नरसंहार था

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इस त्रासदी को दंगा कहने पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने इसे स्पष्ट रूप से नरसंहार करार देते हुए कहा कि जिस तरह से लोगों को चुन-चुनकर घरों से निकाला गया और मौत के घाट उतारा गया, वह आजाद भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय है। उन्होंने कहा कि दिवाली जैसे त्योहार पर अपनों को खोने का दर्द इन परिवारों के लिए आज भी उतना ही ताजा है।

वोटर लिस्ट से हुई थी सिखों की पहचान

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा कि 1984 की हिंसा कोई स्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी। उन्होंने सवाल उठाया कि हमलावरों को कैसे पता था कि किस घर में कौन रहता है? पुरी का आरोप है कि वोटर लिस्ट और अन्य सरकारी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर सिख परिवारों की पहचान की गई थी, ताकि उन्हें निशाना बनाया जा सके। उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के 2018 के उस फैसले का भी जिक्र किया जिसमें इसे मानवता के खिलाफ अपराध (Crimes Against Humanity) माना गया था।

रोंगटे खड़े कर देने वाली आपबीती

संवाद के दौरान पीड़ितों ने अपनी दास्तां सुनाई, जिसे सुनकर वहां मौजूद हर किसी की आंखें नम हो गईं। मनजीत कौर, जो उस समय महज सवा महीने की थीं, ने बताया कि उनके पिता को उनकी मां के सामने बेरहमी से खींचकर ले जाया गया। उनके साथ की गई दरिंदगी का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि उनके पिता की आंखें निकाल ली गईं और फिर उन्हें टायर डालकर जिंदा जला दिया गया। ऐसी ही भयावह कहानियां कमलेश कौर और राजिंदर कौर ने भी साझा कीं, जिन्होंने अपने परिवार और अपनों को खोने के बाद न्याय के लिए दशकों तक संघर्ष किया है।

सरकार का वादा: न्याय और सहायता जारी रहेगी

पीड़ितों के संघर्ष को देखते हुए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने राहत कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के अनुरूप, दिल्ली सरकार अब तक 150 पीड़ित आश्रितों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी दे चुकी है। इस नीति के तहत, यदि मूल आश्रित बुजुर्ग हो चुके हैं, तो वे परिवार के अगले पात्र सदस्य को नौकरी के लिए नामित कर सकते हैं।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि वे उन लोगों को वापस नहीं ला सकते जिन्हें खो दिया गया है, लेकिन उनके परिवारों के जीवन को बेहतर बनाने और उन्हें न्याय दिलाने की दिशा में प्रयास जारी रहेंगे। 1984 की उस हिंसा में आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2,733 लोगों की जान गई थी, और आज भी कई परिवार उस त्रासदी के बोझ तले दबे हुए हैं।

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