बांग्लादेश में रवींद्रनाथ टैगोर का अपमान: खुलना में भित्ति चित्र पर पोती गई काली स्याही
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खुलना: बांग्लादेश में सांस्कृतिक हस्तियों को निशाना बनाने का सिलसिला थम नहीं रहा है। ताजा घटना में खुलना रेलवे स्टेशन की बाहरी दीवार पर बने नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के भित्ति चित्र (म्यूरल) को उपद्रवियों ने काली स्याही से खराब कर दिया है। इस घटना से स्थानीय लोगों और बुद्धिजीवियों में भारी आक्रोश है।

सुनियोजित साजिश की आशंका सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि एक संगठित साजिश है। स्थानीय कला संगठन नट्ट्यालोक के महासचिव शरीफुल इस्लाम सलीम ने कहा कि ढाका के बाद अब खुलना में ऐसी हरकतें यह दर्शाती हैं कि इसके पीछे कोई एजेंडा काम कर रहा है। उन्होंने आशंका जताई कि कट्टरपंथी तत्व इन महान हस्तियों के जरिए देश की धर्मनिरपेक्षता पर हमला कर रहे हैं।

विवाद का आधार: शिवाजी महाराज पर कविता? सोशल मीडिया पर सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, उपद्रवियों ने मौके पर कुछ पोस्टर भी चिपकाए हैं। इन पोस्टरों में दावा किया गया है कि टैगोर के चित्र को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रशंसा में कविता लिखी थी। यह घटना एक ऐसे समय में हुई है जब शहर में प्रधानमंत्री के प्रस्तावित दौरे की तैयारियां चल रही थीं।

प्रशासन की जांच, मगर सुराग तलाशना मुश्किल खुलना सदर पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी लोकमान हुसैन ने पुष्टि की है कि मामले की जांच शुरू कर दी गई है। हालांकि, पुलिस के लिए आरोपियों को पकड़ना बड़ी चुनौती है। चूँकि शुक्रवार के दिन सड़क के किनारे की सभी दुकानें बंद थीं, इसलिए घटना के सटीक समय और दोषियों की पहचान करने के लिए सबूतों का अभाव है।

सांस्कृतिक पहचान पर गहराता संकट यह पहली बार नहीं है जब रवींद्रनाथ टैगोर को निशाना बनाया गया है। पिछले महीने ढाका में बांग्लादेश शिल्पकला अकादमी के बाहर भी टैगोर की पेंटिंग पर काली स्याही पोती गई थी। तब देश के 37 प्रमुख नागरिकों ने संयुक्त बयान जारी कर चेतावनी दी थी कि यह कट्टरपंथियों के बढ़ते हौसले का संकेत है।

इतिहास की पुनरावृत्ति? विशेषज्ञ इस घटना की तुलना 1960 के दशक के उस दौर से कर रहे हैं, जब पाकिस्तानी शासकों ने राजनीतिक कारणों से टैगोर को मुस्लिम-विरोधी घोषित करने का प्रयास किया था। आलोचकों का कहना है कि आज भी वही पुरानी मानसिकता बांग्लादेश की उदारवादी और सांस्कृतिक धरोहर को तोड़ने की कोशिश कर रही है। अब समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने इन घटनाओं के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाने की मांग की है।

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