कुछ भी छुपाने को नहीं है , अमित शाह ने राहुल और अखिलेश को संसद में बहस का दिया खुला चैलेंज
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बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर मचे सियासी घमासान के बीच, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को दो टूक जवाब दिया है। शाह ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव को संसद में खुली बहस की चुनौती दी है।

संसद का विशेष सत्र बुलाने का चैलेंज लखनऊ में आयोजित उत्तर प्रदेश बीजेपी की प्रदेश कार्यकारिणी बैठक को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा, राहुल बाबा, मैं आपको और अखिलेश यादव को चुनौती देता हूं कि बीजेपी संसद में इस मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। हमारे पास छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है। आइए, संसद का विशेष सत्र बुलाते हैं और इस पर बहस करते हैं।

शाह ने विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वे बाहर तो बहस की मांग करते हैं, लेकिन संसद के अंदर कार्यवाही को बाधित करते हैं और सदन चलने ही नहीं देते।

हार नहीं पचा पा रहा विपक्ष अमित शाह ने विपक्ष के रवैये पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि चुनाव हारने के बाद विपक्ष अपनी गलती मानने के बजाय अंपायर (चुनाव आयोग) पर बेईमानी के आरोप लगाने लगता है। शाह के अनुसार, विपक्ष का यह पुराना पैटर्न है कि जब भी वे हारते हैं, तो चुनाव परिणामों को स्वीकार करने के बजाय चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने लगते हैं।

क्या है जन महाभियोग का विवाद? विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक इन दिनों मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आक्रामक है। उनकी मांग है कि SIR की प्रक्रिया वापस ली जाए और मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा दें। इसी क्रम में, आज (31 अक्टूबर) दिल्ली में विपक्ष जन महाभियोग कार्यक्रम आयोजित कर रहा है।

हालांकि, यह कोई संवैधानिक महाभियोग नहीं, बल्कि जनता के बीच आयोजित एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे इसमें महाभियोग प्रस्ताव पेश करने की भूमिका निभाएंगे।

सड़क तक पहुंचा टकराव सियासी खींचतान अब संसद से निकलकर सड़क तक पहुंच गई है। विपक्षी गठबंधन ने 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ी रैली का ऐलान किया है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि इस रैली में शामिल होने आ रहे लोगों को अलग-अलग राज्यों में रोकने की कोशिश की जा रही है।

बहरहाल, अमित शाह के इस खुले चैलेंज ने विपक्ष को एक बड़े धर्मसंकट में डाल दिया है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या विपक्षी दल संसद में बहस के लिए तैयार होंगे या विरोध का यह सिलसिला सड़कों पर ही जारी रहेगा।

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