क्या खत्म हो जाएगी आपराधिक धमकी की धारा? सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला और BNS में इसके मायने
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हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल किसी की शिकायत पर आपराधिक धमकी का केस नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने एक दंपति के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द करते हुए कानून के दुरुपयोग पर लगाम लगाने की बात कही है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी का है। एक महिला ने ससुराल पक्ष के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और आपराधिक धमकी की प्राथमिकी दर्ज कराई थी। मामला कलकत्ता हाईकोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने पाया कि आरोपियों के खिलाफ धमकी देने का कोई ठोस सबूत नहीं था, जिसके बाद उनके खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी गई।

धमकी के नाम पर मनमानी नहीं चलेगी

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि आपराधिक धमकी के मामले में आरोपों का विवरण ठोस होना चाहिए। केवल यह कह देना कि धमकी दी गई या दबाव बनाया गया , कानूनी रूप से पर्याप्त नहीं है। शिकायत में स्पष्ट होना चाहिए कि धमकी किस तरह की थी, किसे नुकसान पहुँचाने की बात कही गई और उसका स्पष्ट मकसद क्या था।

BNS में क्या बदल गया है?

पहले भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 503 और 506 के तहत आपराधिक धमकी और उसकी सजा का प्रावधान था। अब नए कानून (BNS) में इन प्रावधानों को धारा 351 के अंतर्गत लाया गया है।

BNS की धारा 351 के तहत, यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे के शरीर, प्रतिष्ठा या संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की धमकी देकर डर पैदा करता है, तो वह अपराध की श्रेणी में आता है। इसमें मामले की गंभीरता के आधार पर 2 से 7 साल तक की जेल या जुर्माने का प्रावधान है।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानून के जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि धमकी पर पुलिस कार्रवाई नहीं करेगी। अगर शिकायत में ठोस साक्ष्य मिलते हैं, तो पुलिस जांच कर सकती है। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सामान्य कहासुनी या बिना सबूत के लगाए गए आरोपों के आधार पर किसी को कानूनी मुकदमे में फँसाकर परेशान नहीं किया जा सकता।

आगे का रास्ता

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य के उन मामलों के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा, जहाँ अक्सर आपसी विवाद में आपराधिक धमकी की धाराओं का इस्तेमल करके एक-दूसरे को फँसाया जाता है। अब अदालतों में वही मामले टिक पाएंगे, जहाँ धमकी का इरादा और उसका ठोस विवरण स्पष्ट रूप से प्रमाणित होगा।

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