चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट की पैनी नजर: सुनवाई टली, 10 दिन का वक्त क्यों मिला?
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई फिलहाल टल गई है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग द्वारा दाखिल जवाब (हलफनामा) का अध्ययन करने और उस पर अपना पक्ष रखने के लिए 10 दिन की मोहलत दी है। मामले की अगली संभावित सुनवाई 17 नवंबर 2026 को हो सकती है। फिलहाल, अदालत ने किसी भी तरह का कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया है।

आखिर सुनवाई के दौरान क्यों बंद हुआ ऑडियो-वीडियो?

सुनवाई के दौरान एक तकनीकी पहलू चर्चा का विषय बना रहा। रिपोर्ट के अनुसार, कार्यवाही के एक बड़े हिस्से के दौरान ऑडियो-वीडियो प्रसारण बंद था। जब प्रसारण दोबारा शुरू हुआ, तब वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी और डॉ. मेनका गुरुस्वामी अदालत में मौजूद दिखे। हालांकि, प्रसारण बंद होने की आधिकारिक वजह स्पष्ट नहीं है, लेकिन सिंघवी ने चुनाव आयोग की आंतरिक फाइलों और अधिकारियों की टिप्पणियों को सुरक्षित रखने की मांग की है, ताकि फैसलों की पारदर्शिता जांची जा सके। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, हम सब देखेंगे, जांच करेंगे।

चुनाव आयोग पर क्या हैं गंभीर आरोप?

यह विवाद केवल मुख्य चुनाव आयुक्त तक सीमित नहीं है, बल्कि आयोग की संपूर्ण निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाता है। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे समेत इंडिया गठबंधन के नेताओं और अन्य याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि आयोग के कई फैसले, विशेषकर एसआईआर (SIR) प्रक्रिया से जुड़े निर्णय, अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया था कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच 14 फैसलों पर अन्य आयुक्तों ने लिखित आपत्तियां जताई थीं। इसके अलावा, मतदाता सूची से लाखों नाम कटने और डेटा हैंडलिंग को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

चुनाव आयोग ने हलफनामे में क्या कहा?

अपने जवाबी हलफनामे में चुनाव आयोग ने एकतरफा फैसले लेने के सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। आयोग का कहना है कि एसआईआर से जुड़े सभी फैसले पूरे आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए थे। फॉर्म-6 में किसी भी औपचारिक बदलाव के आरोपों पर आयोग ने सफाई दी कि यह प्रक्रिया केवल ऑनलाइन आवेदन को सुव्यवस्थित करने के लिए थी, न कि नियमों को बदलने के लिए। आयोग के वकील मनिंदर सिंह ने विपक्षी नेताओं द्वारा उठाए गए सवालों को बाहरी बयानबाजी करार दिया।

फॉर्म-6 और मतदाताओं की चिंता

विवाद का एक बड़ा हिस्सा फॉर्म-6 से जुड़ा है, जिसका इस्तेमाल नए मतदाता पंजीकरण के लिए होता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि एसआईआर के दौरान मांगी गई अतिरिक्त जानकारी (जैसे पुश्तैनी मतदाता होने की जानकारी) से उन लोगों के अधिकारों का हनन हो सकता है, जिनका परिवार पहले से मतदाता सूची में नहीं है। अदालत के लिए अब यह तय करना चुनौती है कि क्या आयोग की डिजिटल व्यवस्था कानूनी प्रावधानों के दायरे में थी या इसने चुनावी प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न की।

अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक किसी भी आरोप को सही या गलत नहीं माना है। अदालत का मुख्य फोकस इस बात पर होगा कि क्या चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी थी और क्या संवैधानिक मर्यादाओं का पालन किया गया। आने वाली सुनवाई में फाइलों का अवलोकन और आयोग के आंतरिक संवाद की पड़ताल इस मामले का रुख तय करेगी। फिलहाल, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के पद बने रहने या आयोग के फैसलों पर रोक लगाने को लेकर कोई भी निर्णय नहीं लिया गया है।

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