क्लाइमेट फाइनेंस पर पीयूष गोयल का तीखा वार: अमीर देश पहले अपना इतिहास देखें
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जलवायु परिवर्तन की वैश्विक जंग में अब कार्बन टैक्स को लेकर नया विवाद छिड़ गया है। बर्लिन में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने यूरोपीय संघ (EU) के नए नियमों पर सवाल उठाकर एक बड़ी बहस शुरू कर दी है। उनका कहना है कि विकासशील देशों पर पर्यावरण के नाम पर अतिरिक्त बोझ डालना न केवल अनुचित है, बल्कि यह खुद यूरोप की अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचाएगा।

यूरोपीय संघ के नियमों पर क्यों भड़के गोयल? यूरोपीय संघ ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) लागू किया है। इसके तहत स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट जैसे आयातित उत्पादों पर कार्बन टैक्स लगेगा। भारत का मानना है कि इससे उसके निर्यात महंगे हो जाएंगे और यूरोपीय बाजार में भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाएगी। गोयल के अनुसार, लगातार बढ़ते नियमों से यूरोप अपने ही उद्योगों को महंगा बना रहा है, जिससे बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की लागत बढ़ेगी।

कौन है कार्बन का असली गुनहगार? दुनिया में कार्बन उत्सर्जन के आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है:

भारत का तर्क है कि दुनिया की 17 फीसदी आबादी भारत में रहती है, लेकिन वैश्विक उत्सर्जन में उसकी हिस्सेदारी महज 8.3 फीसदी है। भारत ने दशकों तक जीवाश्म ईंधन का उपयोग करने वाले विकसित देशों को याद दिलाया है कि वे अपनी औद्योगिक सफलता की नींव पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर ही रख पाए हैं।

क्लाइमेट फाइनेंस: वादे और हकीकत जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए विकसित देशों ने सालाना 100 अरब डॉलर के क्लाइमेट फाइनेंस का वादा किया था। हालांकि यह लक्ष्य अब पूरा हो रहा है, लेकिन विकासशील देशों का आरोप है कि ये मदद अक्सर कर्ज के रूप में आती है। भारत का साफ कहना है कि जिम्मेदारी साझा होनी चाहिए, लेकिन ऐतिहासिक रूप से जिन्होंने ज्यादा प्रदूषण फैलाया है, उन्हें तकनीक हस्तांतरण और आर्थिक मदद के वादे निभाने चाहिए।

भारत का रुख: साझा लेकिन अलग जिम्मेदारियां भारत साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों (CBDR) के सिद्धांत पर अडिग है। इसका मतलब है कि जलवायु परिवर्तन से निपटना सभी की जिम्मेदारी है, लेकिन विकासशील देशों को अपनी बढ़ती आबादी के लिए बिजली, रोजगार और आवास सुनिश्चित करना जरूरी है। भारत अपनी अर्थव्यवस्था को तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर ले जा रहा है, लेकिन यह बदलाव आर्थिक बोझ के साथ नहीं, बल्कि सहयोग के साथ आना चाहिए।

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